जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध इस्तेमाल से बढ़ते जलवायु संकट के बीच पूरी दुनिया में स्वच्छ ईंधन की जरूरत महसूस की जाने लगी है। मगर इस दिशा में प्रयास बहुत कम हो रहे हैं। स्वच्छ ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर योजनाएं तो बन रही हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन की गति बेहद धीमी है, जबकि जीवाश्म ईंधन पर अब भी ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता तो है, लेकिन इससे निपटने के उपायों पर गंभीरता से काम नहीं हो पा रहा है।
विश्व आर्थिक मंच की ओर से हाल में जारी एक रपट में भी इसका उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि स्वच्छ ईंधन से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वर्ष 2030 तक निवेश को चार गुना बढ़ा कर सालाना सौ अरब डालर करने की आवश्यकता है। जाहिर है कि अगर इस तरह की चेतावनियों और सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो भविष्य में इसके भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं।
गौरतलब है कि दुनिया भर में इस समय स्वच्छ ईंधन पर सालाना करीब पच्चीस अरब डालर ही निवेश हो रहा है। दरअसल, स्वच्छ ईंधन को लेकर दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन इससे संबंधित योजनाओं की लागत अधिक होने से कई देश पीछे हट जाते हैं।
वहीं सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन कर रहे विकसित देश खुद इसमें कटौती करने के बजाय छोटे और विकासशील देश पर नाहक दबाव बनाते रहे हैं। ऐसे में स्वच्छ ईंधन को साझा प्रयासों से प्रोत्साहित करने का वैश्विक लक्ष्य कहीं पीछे छूट जाता है। इसमें दोराय नहीं कि जलवायु संकट से निपटने की दिशा में स्वच्छ ईंधन अहम भूमिका निभा सकता है। इसके इस्तेमाल से उद्योगों और परिवहन क्षेत्र में बढ़ते उत्सर्जन को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
लिहाजा स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल के लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए न केवल भरोसेमंद और निवेश-योग्य परियोजनाएं बनानी होंगी, बल्कि उन्हें सख्ती से लागू भी करना होगा। जीवाश्म ईंधन के निरंतर इस्तेमाल से पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। इस संकट से बचने के लिए स्वच्छ ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा ही बेहतर विकल्प है।
