दिल्ली में आम आदमी पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता की खुदकुशी की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि इस पार्टी में अपने सदस्यों की शिकायत और पीड़ा सुनने की कितनी हिम्मत बची है। हालांकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर वक्त सीधे जनता से जुड़ कर उसकी समस्याओं का समाधान का दावा करते रहते हैं, लेकिन शायद उनके लिए अपनी पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं के दर्द की कोई अहमियत नहीं है। गौरतलब है कि बाहरी दिल्ली के नरेला इलाके में ‘आप’ की एक महिला कार्यकर्ता ने रमेश भारद्वाज नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की थी। लेकिन इसके बावजूद पार्टी ने महिला की शिकायत पर गौर करना जरूरी नहीं समझा। एक बार दिल्ली में पार्टी के संयोजक दिलीप पांडेय के सामने आरोपी ने माफी भी मांगी।
लेकिन इस मामले में शिकायतों और दर्ज एफआइआर के बावजूद उसने ऐसा करना जारी रखा। तमाम प्रलोभनों के बावजूद महिला ने कोई समझौता करने से इनकार कर दिया तो उसे धमकियां दी गर्इं। हर तरफ से हार कर जब महिला ने आत्महत्या कर ली, तो पार्टी की ओर से सफाई दी गई है कि आरोपी का ‘आप’ से कोई संबंध नहीं था। अव्वल तो आरोपी रमेश भारद्वाज को स्थानीय विधायक का करीबी माना जाता है और खबरों के मुताबिक वह ‘आप’ का कार्यकर्ता भी रहा। अगर ऐसा न भी होता तो क्या अपनी महिला सदस्य का यौन उत्पीड़न आम आदमी पार्टी के लिए कोई परेशानी का विषय नहीं है? बल्कि एक साधारण महिला नागरिक के साथ भी ऐसा होता है, तो सत्ताधारी पार्टी का ऐसा रुख अपनाना कितना उचित है? अंदाजा लगाया जा सकता है कि यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला किन हालात में अपनी जान देने के फैसले तक पहुंची होगी!
आम आदमी पार्टी का अपने विधायकों या सदस्यों पर लगे आरोपों से पल्ला झाड़ना या उनके बचाव में खड़ा होना कोई नई बात नहीं है। कुछ साल पहले पार्टी के विधायक सोमनाथ भारती पर जब भीड़ के साथ कुछ अफ्रीकी मूल की महिलाओं के उत्पीड़न का आरोप लगा था तब भी पार्टी उनके बचाव में खड़ी हो गई थी। तब ‘आप’ की एक संस्थापक महिला सदस्य मधु भादुड़ी ने यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी थी कि पार्टी की नजर में महिलाओं की पीड़ा के लिए कोई जगह नहीं है। हालांकि सत्ता में आने के पहले आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर वह लगाम लगाएगी और उनकी सुरक्षा के तमाम इंतजाम करेगी।
मगर हकीकत यह है कि दिल्ली में आज भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध बदस्तूर जारी हैं और उनकी सुरक्षा के सवाल ज्यों के त्यों बने हुए हैं। सवाल है कि जो पार्टी अपनी ही किसी कार्यकर्ता को न्याय दिलाने के लिए कोई सख्त रवैया अपनाने से इसलिए हिचक जाती है कि आरोपी किसी विधायक का नजदीकी है, उससे आम महिलाओं की सुरक्षा की क्या उम्मीद की जाए! यह याद करने की जरूरत है कि दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी का उदय भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली स्वच्छ छवि और ईमानदारी के दावे करने वाली पार्टी के रूप में हुआ था। लेकिन ऐसा लगता है कि अब भ्रष्टाचार के मोर्चे से लेकर जन-सरोकार के मुद्दों तक पर पार्टी के उन दावों और वादों का कोई मतलब नहीं रह गया है।
