कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के युवा कमांडर बुरहान मुस्तफा वानी के मारे जाने के विरोध में जितनी बड़ी हिंसा हुई और जितने लोग उसकी शव यात्रा में शामिल हुए, वैसा पिछले 25-26 सालों में कभी नहीं हुआ। यह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। बुरहान वानी सेना की किसी गफलत या मनमानी की वजह से नहीं मारा गया। उस पर दस लाख रुपए का इनाम घोषित था। मगर उसकी शव यात्रा में शामिल होने हजारों लोग जुटे और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पों पर उतर आए। सुरक्षा बलों के ठिकानों पर तोड़-फोड़ की और आग लगा दी। इस पर काबू पाने में की गई गोलीबारी में ग्यारह लोग मारे गए और सौ से ज्यादा घायल हो गए। आखिरकार अमरनाथ यात्रा रोक दी गई, पूरी घाटी में कर्फ्यू लगाना पड़ा।
अभी तक सेना की ज्यादतियों के विरोध में घाटी के लोग ऐसी हिंसा पर उतारू होते देखे जाते रहे हैं। किसी आतंकवादी के मारे जाने पर ऐसा जनाक्रोश लंबे समय से नहीं फूटा। बुरहान की शव यात्रा में कम से कम दो अलगाववादी धड़े शामिल हुए और एक बार फिर कश्मीर की आजादी के नारे लगाए गए। पाकिस्तान का झंडा फहराया गया। तो क्या यह समझना चाहिए कि कश्मीर एक बार फिर नए सिरे से चरमपंथी तरीके से अपने हकों के लिए लड़ने पर उतारू है! पिछले कुछ सालों में जिस तरह के जख्म कश्मीर ने आतंकवादी के नाम पर झेले थे और वहां शांति के लिए आमराय बननी शुरू हुई थी, चरमपंथ से उनका भरोसा डिगा था, क्या वह फिर से वहां वापस लौट रहा है? जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने युवाओं के भटकाव और उनके मारे जाने पर अफसोस जाहिर किया है। मगर सवाल है कि युवाओं के भटकाव को रोकने के लिए जो प्रयास पहले किए गए, उनका असर क्यों नहीं हो पा रहा। क्यों वे चरमपंथी गतिविधियों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं?
कश्मीर में युवाओं के गुमराह होने की बड़ी वजह रोजगार के अवसरों का न होना है। जिसके लिए पिछले दस-बारह सालों में काफी प्रयास किए गए। उसका सकारात्मक नतीजा भी दिखाई देने लगा था। मगर अभी जिस तरह से वहां कश्मीर की आजादी के नारे लगने शुरू हुए हैं और पाकिस्तान का झंडा लहराया जाने लगा है, उसने यही जाहिर किया है कि वजहें और भी हैं। पाकिस्तान से कश्मीर में आतंकवाद को मिल रही इमदाद छिपी नहीं है, उसके चलते घाटी के कुछ अलगाववादी संगठन युवाओं को गुमराह करने में सफल होते रहे हैं। मगर जब से कश्मीर में नई सरकार बनी है, युवाओं में अलगाववादी मानसिकता गहरी होती गई है। यह केवल रोजगार की कमी की वजह से या सेना की ज्यादतियों के चलते पैदा हुई मानसिकता नहीं है। इसमें एक प्रकार की धार्मिक कट्टरता है। यह कट्टरता इस्लाम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन रहे माहौल की वजह से भी पैदा हुई है। जब पूरी घाटी में हजारों लोग इस तरह अलगाववादी नारे लगाते हुए निकल पड़ें तो सोचने की जरूरत है कि इस मानसिकता को, इस प्रतिरोध को सेना के बल पर नहीं दबाया जा सकता। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। अलगाववादी संगठनों से बातचीत करने, घाटी के मानस को समझने और फिर युवाओं के भटकाव को रोकने का प्रयास होना चाहिए। मगर फिलहाल न तो केंद्र और न राज्य सरकार के रुख से जाहिर हो रहा है कि वे इस घटना को गंभीरता से ले रहे हैं।
