करीब एक महीने के भीतर यह तीसरा मौका है जब अमेरिका ने आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर जनरल जोसेफ वोटल ने पाकिस्तान यात्रा के दौरान वहां के शीर्ष नेताओं से दो टूक कहा कि सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल उसके पड़ोसियों के खिलाफ आतंकवादी हमले करने या फिर उसकी योजना बनाने में न हो। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब भारत के अलावा दूसरे देशों ने पाकिस्तान से अपनी जमीन पर आतंकियों को पनाह न देने को कहा हो। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि इस मसले पर बुरी तरह घिरने और तमाम अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकी गतिविधियां संचालित होने के खिलाफ कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाता है। यों पाकिस्तान ने जनरल वोटल के सामने अफगानिस्तान की अशांति के साथ-साथ कश्मीर का मामला भी उठाया और क्षेत्रीय हितों के मुद््दों को हल करने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर काम करने की बात कही। जाहिर है, अगर अमेरिका कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की ओर से नाहक दखलंदाजी की अनदेखी करके सिर्फ आतंकवाद के पहलू पर उसे सलाह देता है तो इससे स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आने वाला।

यह किसी से छिपा नहीं है कि लश्कर-ए-तैयबा से लेकर हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे कई आतंकी संगठनों को कहां से खुराक और मदद मिलती है। कश्मीर में दखल देने के मकसद से ही इन आतंकी समूहों को पाकिस्तान संरक्षण देता रहा है। तो पाकिस्तान को कश्मीर मामले से अलग रहने की हिदायत के बिना सिर्फ आतंकवाद पर नसीहत से कुछ खास हासिल नहीं होना है। पर भारत के लिए यह भी कम संतोष की बात नहीं है कि कुछ समय से अमेरिका ने आतंकियों को पनाह देने के मुद््दे पर पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार किया हुआ है। तकरीबन एक महीने पहले आतंकवाद पर जारी एक वार्षिक रिपोर्ट में जब यह बात सामने आई कि पाकिस्तान में लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठन अब भी सक्रिय हैं तो अमेरिका ने पाकिस्तान को उन देशों को सूची में डाल दिया जो आतंकवादियों को शरण देते हैं।

अमेरिकी संस्था सीएसआइएस की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान एक ओर अपनी जमीन पर आतंकियों को पालता है और दूसरी ओर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर अमेरिका से अरबों रुपए की मदद भी लेता रहा है। यहां तक कि जिस तालिबान को अमेरिका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, उसे भी पाकिस्तान के भीतर से काम करने में दिक्कत नहीं होती है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के हितों पर हक्कानी नेटवर्क के हमले को लेकर पाकिस्तान से उसके खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया था। फिर भी जब हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ ‘पर्याप्त कदम’ उठाए जाने की पुष्टि नहीं हुई तब अमेरिका ने पाकिस्तान को गठबंधन कोष में पैंतीस करोड़ डॉलर की मदद नहीं देने का फैसला किया। आमतौर पर अपनी जमीन पर आतंक को संरक्षण न देने की सलाह को पाकिस्तान एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देता रहा है। देखना है कि अमेरिका की ताजा सलाह का उस पर क्या असर पड़ता है!