भारत में धार्मिक आयोजन और मौतें जैसे एक दूसरे का पर्याय बनती जा रही हैं। केरल के सबरीमाला मंदिर में भगदड़ से हुई मौतों को अभी महीना भी नहीं बीता था कि मकर संक्रांति के मौके पर पश्चिम बंगाल और बिहार में कुल तीस लोग हादसे के शिकार हो गए। मकर संक्रांति के दिन कोलकाता से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर गंगासागर के कचबुड़िया इलाके में एक घाट पर अचानक भगदड़ मच गई। हुआ यों कि मुड़ीगंगा नदी में ज्वार आने लगा तो मौके पर पहुंचे जलपोत में चढ़ने के लिए धक्कामुक्की शुरू हो गई। दो घंटे से कोई जलपोत नहीं पहुंचा था और शाम भी होने लगी थी। जलपोत आया तो उसमें सवार होने के लिए स्नानार्थियों की हड़बड़ी बढ़ गई। इस अफरातफरी में कई लोग फिसल कर नदी में जा गिरे। दो की मौके पर और चार की बाद में अस्पताल में मौत हो गई। इससे पहले, पटना में भी उसी दिन शाम के वक्त एक दर्दनाक वाकया हुआ, जब गंगा तट पर आयोजित पतंगोत्सव देख कर घर लौट रहे चौबीस लोगों की नाव पलटने से डूब कर मौत हो गई। इसमें महिलाएं और बच्चियां भी शामिल थीं।

दोनों घटनाओं में भयंकर प्रशासनिक लापरवाही हुई है। गंगासागर की घटना में जहां लोग स्नान करने गए थे, वहां जलपोत की कमी थी। इसी वजह से जब जलपोत दो घंटे बाद आया और उधर ज्वार भी बढ़ने लगा तो तीर्थयात्री यह सोच कर घबरा उठे कि कहीं ऐसा न हो कि पानी घाट पर बढ़ जाए और वे जलपोत में सवार न हो पाएं। उधर, पटना में जब पतंगोत्सव से जाने का वक्त हुआ यानी शाम होने को आई तो उससे पहले अपराह्न दो बजे ही स्टीमर सेवा बंद कर दी गई। यहां भी जल्दबाजी के चक्कर में क्षमता से कहीं अधिक, बीस की जगह साठ से अधिक लोग नाव में सवार हो गए। बीच नदी में पहुंचने पर नाव का जेनरेटर फट गया, जिससे नाव में बैठे लोग घबरा उठे। उनकी तेज हलचल के कारण नाव पलट गई, जिसका नतीजा रहा, दो दर्जन लोगों की मौत। यह बात भी दर्ज की जानी चाहिए कि शाम चार बजे के बाद गंगा में नाव चलाने की मनाही थी, फिर उसे क्यों जाने दिया गया? एक अध्ययन के मुताबिक भारत में सन 2000 से अब तक भगदड़ में सवा चार हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। इनमें अस्सी फीसद धार्मिक पर्वों और आयोजनों में मारे गए हैं। मौत के बाद, जैसा कि होता है, कुछ मुआवजा राशि घोषित की जाती है और खानापूरी के लिए जांच बैठा दी जाती है। फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहता है।

दुनिया के किसी और देश में हर साल भगदड़ से इतने लोग नहीं मारे जाते। लेकिन केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, शायद ही ऐसी दुर्घटनाओं से कोई सबक लिया जाता है। धार्मिक पर्वों पर जुटने वाली भीड़ को लेकर स्थानीय प्रशासन हमेशा सब कुछ चाक-चौबंद होने का दावा करता है। मगर आपदा-राहत, भीड़ प्रबंधन और प्रशासन के साथ-साथ आयोजकों की भी जिम्मेवारी तय करने की जो बातें होती हैं, उन पर अमल क्यों नहीं होता? क्या इसलिए कि ऐसे भीड़ भरे आयोजनों और मेलों में हादसे के शिकार गरीब, साधारण लोग होते हैं?