सुरेश सेठ
बदलते जमाने की खोज-पड़ताल करते हैं तो लगता है पहले के स्थापित मूल्य आज अवमूल्यित हो चुके हैं। बुजुर्गों का आदर उन्हें वृद्धाश्रम तक पहुंचा देने के बाद शुरू करने की कसम खाई जाती है। संतान की उद्दंडता और अभद्रता के आदी तो बुजुर्ग पीढ़ी के लोग हो ही चुके हैं, जो पहले था, आज उसकी शक्ल भी पहचानी नहीं जाती। बहुत पहले बलिदान की परिभाषा में अपना घर-द्वार त्याग, सुख-सुविधा की चिंता छोड़ केवल उन लोगों की चिंता करना रह गया था, जो सदी-दर-सदी आर्थिक पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े रहते हैं और बड़े मालिकों के पद-चुंबन के बावजूद उनके अधूरे सपने और टूट, और बिखर कर बेगाने हो जाते हैं।
बेगानेपन का उच्छवास जब प्रासादों का सदाजीवी चंदोबा बनने लगता था, तब उन्हीं में से देश का यौवन जागता था। हर घर से एक भगत सिंह आगे आकर मां भारती के तन-बदन पर जकड़ी विदेशी हुकमरानों की बेड़ियों को चीर कर उनके लिए जिम्मेदार धरती का सृजन करने के साथ, उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान का अधिकार दिलाने की कसम खा अपने बलिदानों को बदलाव की क्रांति में तब्दील करने के लिए जूझ मरता था।
लोग भगत सिंह के पैदा होने की इच्छा रखते हैं, लेकिन अपने नहीं, पड़ोसी के घर में
आज ऐसी भावनाओं को दोहराने क्या, पोषित करने की भी कोई जहमत नहीं उठाता। देश के लोग आज भी इस धरती पर भगत सिंह के पैदा होने की इच्छा रखते हैं, लेकिन अपने नहीं, पड़ोसी के घर में। अपने घर में तो जो लल्ला पैदा हो, वह जन्म लेते ही भाषण मुद्रा में आ जाए। ऐसे लोग हथेली पर सरसों जमाने में माहिर होने चाहिए। आज कठपुतलियां क्रांति का उद्घोष करती हैं, और इसके बाद एक परिवर्तन युद्ध लड़ा जाता है, जिसमें कैप्टन हैं तो उनके पीछे सेना नहीं और सेना है तो उसके आगे कैप्टन नहीं।
कथावाचक भी यही कह देता है, ‘भक्तों, हर पांच बरस के बाद यह घनघोर युद्ध हुआ। नारों और उत्तेजक भाषणों के साथ एक दूसरे पर खूब वार हुए।’ सेना और युद्धवीरों की पहचान भी नहीं होती। कल यह आक्रामक की वर्दी पहन कर लड़ते हैं और दूसरे दिन वर्दी बदल इन्हें आक्रांता बनते देर नहीं लगती।
वंचित वर्ग के लोग सिर्फ इंतजार के भरोसे बैठे रहते हैं
इन्हें ‘आया राम, गया राम’ की संज्ञा देकर इनकी राजनीति का अपमान नहीं करना चाहिए। ये तो क्रांति के ध्वजवाहक हैं कि जिधर अपना अंगद का पांव नहीं जमता देखा, वहीं खिसक जाएं, कहीं और नए समाज का निर्माण करने के लिए। यह दस प्रतिशत शीर्ष जनता का खेला है और जिनके बारे में बताया गया है कि ये देश की नब्बे फीसद धन-संपदा के मालिक हैं और अपनी अगली पीढ़ियों के लिए रखवाले भी। शेष नब्बे फीसद जनता वंचित-प्रवंचित हो जोशीले नारों की खुराक पर पलती है और भूख से न मरने देने का मूल अधिकार देश की न्यायिक पीठ से पाकर देश की विस्तृत होती हुई खुश्क संस्कृति से पोषित होते हैं। ये लोग न मरते हैं, न जीते हैं। उसे काम-धंधा पा लेने का अधिकार नहीं मिलता, मिलता है तो केवल इंतजार, जो अपने न पूरा होके सपनों को देखते हुए और भी बेचारा हो जाता है।
अब इन बेचारों की सुध लेने के लिए अपने एकांतवास को त्याग कर मसीहा आएंगे। जमी-जमाई गद्दियों को उधेड़ उनके अधिपतियों को निर्वासित कर देंगे और अपनी स्वघोषित आभा के साथ अंधेरे आंगनों को नई रोशनी से भर देने की चिल्लाहट का जमा उजास बनेंगे। यह चिल्लाहट सदा बहुत हड़बड़ी में रहती है। यह हड़बड़ी लोगों की खाली हथेलियों पर नए सपनों की सरसों उगा देना चाहती है। वह हर पुरानी कतार को त्याज्य बता कर उन नई कतारों का सृजन करना चाहती है, जो उनकी इजाजत से शुरू होकर उनके बंधुओं पर खत्म हो जाती हैं। क्रांति होती है, लेकिन अगर वह बगल के घर से शुरू होकर उनके घर पर ठिठकने की बजाय सीधे निकल जाए तो बाद में उसका जयघोष करना सरल हो जाता है।
कभी हम चाहते थे कि देश का रंग खुशरंग कर देने के लिए हर घर में भगत सिंह पैदा हो जाएं। आज चाहते हैं कि हर कोने में अपनी-अपनी काल्पनिक कतारों के अलंबरदार पैदा हो जाएं। सदियों इस देश की बहुसंख्या उपेक्षित रहे तो कोई चिंता नहीं, लेकिन अगर इन नए मसीहाओं की बात को शिरोधार्य नहीं किया तो फिर वह विप्लव पैदा हो जाएगा, जिसे प्याली में उठता हुआ तूफान कहते हैं। उन्हें लगा था कि शायद दूसरे की प्याली अधिक चमकदार हो गई है। तब प्यालियों में उठता तूफान एक-दूसरे से टकरा जाता है। लोगों को लगा कि क्या क्रांति हो गई? क्या वह सब विदा हो गया, जिसने उसे वंचित से प्रवंचित बना दिया था?
ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। केवल कुछ प्यालियां थीं जो एक-दूसरे से टकरा कर टूट गईं और आपने उसे चाय की प्याली में उठता हुआ तूफान भी नहीं कहा। बस, एक लंबा इंतजार था जो वहीं अलसाता हुआ पसर गया है और अभी उसके खत्म होने की कोई संभावना नहीं लगती। चाहे एक दिन वह खत्म हो जाएगा, ऐसे दिलासों की कमी नहीं।
