वंदना तिवारी

कुछ दिन पहले दक्षिणी दिल्ली के पॉश इलाके में मैं अपनी एक मित्र के घर रहने गई। शाम में हम दोनों ने बाहर खाना खाने का तय किया। लगभग सात बजे हम दोनों घर से एक रेस्टोरेंट के लिए निकले। कुछ दूर चलने पर एक जगह भीड़ दिखी। नजदीक जाने पर देखा कि एक महिला की अर्थी रखी थी। चारों तरफ एकत्रित भीड़ मौन-मूक और लगभग स्तब्ध थी। पास खड़े एक सिपाही से मैंने पूछा तो पता चला कि महिला की छह माह पहले ही शादी हुई थी और वह अपने ससुराल आई थी। लेकिन जिन सपनों को संजो कर वह आई थी, वह आते ही टूट गया था। ससुराल वालों के इरादों से अनजान वह महिला शुरू में सामंजस्य बिठाने की विफल कोशिश करती रही, लेकिन लगातार दहेज के लिए प्रताड़ना ने उसे अंदर से निहायत कमजोर और अकेला बना दिया। फिर पति के हिंसक व्यवहार ने उसके जीवन के सारे सपनों को निगल लिया। शादी एक सामाजिक विश्वास की परिणति है। दो संस्कृतियों का मिलन है। दो अपरिचित हृदय का संगम है। सपनों को यथार्थ में परिणत करने का उपक्रम है। उस महिला के लिए विवाह के मायने क्या रहे होंगे, इसे सहज ही समझा जा सकता है। मैंने वहां बात करनी शुरू की तो जानकारी मिली कि प्रथम दृष्टया लगा कि महिला ने गले में फंदा लगा लगा कर आत्महत्या की थी, लेकिन अन्य साक्ष्य यही बता रहे थे कि उस महिला ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि उसके गले में फंदा डाल कर उसे नृशंस तरीके से मार डाला गया था। इसमें उसका निर्दयी पति और परिवार के बाकी लोगों की भागीदारी थी।
पुलिस अधिकारी जिस तरह सामान्य मनोभाव से अपनी बात रखते गए, उसी तरह मेरी सहेली उस तथ्य को असामान्य तरीके से स्वीकार करती गई। मेरे और मेरी मित्र के लिए यह सिर्फ एक घटना भर नहीं थी, बल्कि संपूर्ण स्त्री चेतना पर बर्बर प्रहार की तरह थी। मेरी मित्र के मन में भी असंख्य सवाल उठने लगे। रेस्टोरेंट जाकर खाना खाने की बात तो हम दोनों ने शायद भुला दिया था। मन तनाव, बल्कि गुस्से से भर उठा था। अखिर आधी दुनिया का सच कितना कमजोर है। सम्मान के साथ जीवन जीने की आजादी हमसे क्यों छीन ली जाती है। दिल्ली जैसे महानगर में जब महिलाएं इतनी असुरक्षित हैं तो सुदूर देहातों के बीच का सच क्या होगा!

मेरी मित्र का यह सवाल मुझे स्तब्ध कर गया कि क्या यही दिल्ली है। सरकार के दावों का खोखलापन आखिकार कब खत्म होगा? तेजाबी हमला, सामूहिक बलात्कार, दहेज हत्या, भू्रणहत्या, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना आदि से जुझती स्त्री कब मुक्त होगी? समाज की सोच में बदलाव कब आएगा? ऊंची-ऊंची कॉरपोरेट की इमारतें, आॅफिस, बस, ट्रेन, हवाई जहाज में सफर कर रही महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहा अपराध महिलाओं में अवसाद, असुरक्षा और तनाव को जन्म दे रहा है। इस पुरुषवादी समाज में आखिर महिलाएं कहां जाएं? अधिकार और कर्तव्य के दोराहों पर चलती स्त्री की नियति अगर हत्या, अवसाद, चीत्कार है तो सरकार और संविधान नाम की संस्था का होना क्यों जरूरी है?
‘यत्र नार्या: पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ से लेकर ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो’ की घोषणा की जाती है, लेकिन स्त्री के समाजशास्त्र और व्यवहार के मनोविज्ञान के बीच कितना फासला है और यह लगातार क्यों बढ़ता जा रहा है। स्त्री क्या सिर्फ एक देह है? स्त्रीत्व की संपूर्ण चेतना क्या उसके शरीर के भूगोल पर ही केंद्रित है? घर की चारदिवारी से लेकर संसद की चौखट तक उसकी बातों को, उसकी घनीभूत पीड़ा को, उसके मौलिक अधिकारों को अनसुना क्यों किया जाता है। इतिहास के पन्ने स्त्री-यातना से आखिरकार कब तक कलंकित होते रहेंगे? स्त्री को सम्मान और समांतर दर्जा देने के लिए हमें और कितने निर्भया चाहिए? जन्म लेने के पहले से ही दोयम होने का दंश झेलती स्त्री अपने जीवन के अंतिम पल तक संघर्ष में खुद को शामिल पाती है। लैंगिक भेद से इस दुखद यात्रा की शुरुआत होती है और अंत हमेशा बर्बर, यातनाप्रद, मार्मिक और शोक से भर देने वाला होता है।

महानगरों में स्त्री अपने अधिकारों के प्रति फिर भी सचेत है, लेकिन सुदूर गांव में तमाम तरह की हिंसा की शिकार स्त्री का जीवन कितना कष्टप्रद है, इस सच को वहीं जाकर महसूस किया जा सकता है। स्त्री की भूमिका का विविध संसार हमें सदैव उसके योगदान और निर्माण की महती भागीदारी के बारे में बताता है। हम उससे मुंह नहीं चुरा सकते हैं। महिला सुरक्षा के गंभीर मुद्दे आज और भी मुखर हैं। बात जब महानगर और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हो तो चेहरा शर्म से झुक जाता है। चकाचौंध, फ्लाईओवरों, मेट्रो, विश्वस्तरीय हवाई अड्डे, संसद से लेकर पांच सितारा होटल, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया, आइआइटी जैसे उच्च मानक शैक्षिक संस्थानों के बीच एक आम स्त्री की पीड़ा और उसके संकट की आवाज अनसुनी क्यों रह जाती है? आखिर ऐसे तमाम प्रश्न आधुनिकता का दावा करते इस समाज में भी अनुत्तरित क्यों है?