हमारा समाज इतना विकृत और रुग्ण हो गया है कि कोई बहुत जघन्य घटना भी हमें सिर्फ कुछ दिनों तक विचलित करती है। फिर जब तक कोई और भयंकर घटना सामने नहीं आती, हमारी दिनचर्या सामान्य रहती है। मानवीय संवेदनाओं का क्षरण इस कदर हो गया है कि क्रूरतम अपराध और स्त्री विरोधी बर्बरताएं भी हमें सामान्य समाचार लगने लगी हैं।
कुछ समय पहले लखनऊ के एक स्कूल में बलात्कार के प्रयास की एक ऐसी ही घटना सामने आई। इसमें शुरुआती कक्षा में पढ़ने वाली पीड़ित बच्ची की उम्र मात्र साढ़े तीन साल है और आरोपी पहली कक्षा में पढ़ने वाला सात साल का बच्चा है। छात्रा के माता-पिता ने मुकदमा तब दर्ज कराया जब हेडमास्टर ने छात्रा को स्कूल आने से यह कहते हुए मना कर दिया कि बच्चे उसे चिढ़ाएंगे।
यह घटना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकती है। निश्चित तौर पर यह हमारे समाज की सांस्कृतिक पतनशीलता की घिनौनी तस्वीर है। लेकिन हमारा समूचा समाज जहां जा रहा है, वहां यह शायद अप्रत्याशित नहीं है। हमारे समाज के रग-रग में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच तो इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार है ही जो बच्चों को बचपन से ही सिखाती है कि लड़के हर हाल में लड़कियों से श्रेष्ठ होते हैं। यही कारण है कि लड़के वयस्क होने पर लड़कियों को महज शरीर और एक वस्तु समझते हैं।
यह धारणा केवल समाज के गरीब या निचले कहे जाने वाले तबकों के बीच नहीं है। तथाकथित प्रगतिशील मध्यवर्ग की आबादी भी इसी बीमारी से ग्रस्त है। ऊपर उल्लिखित घटना में आखिर किस अपराध में हेडमास्टर ने छात्रा को स्कूल से निकाल दिया? इसके पीछे कौन-सी मानसिकता काम करती है? मीडिया भी इन घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं है।
फिल्मों से लेकर विज्ञापनों तक में महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जरा सोचिए, जब एक सात-आठ साल का बच्चा टीवी पर देखता है कि एक लड़का कोई इत्र या परफ्यूम लगाता है और चारों ओर से लड़कियां उसके पीछे दौड़ने लगती हैं, या फिर कोई खास अंडरवियर पहनते ही लड़के पर लड़कियां चुंबनों की बौछार कर देती हैं, तो उसके मन में लड़कियों के बारे में क्या धारणा बनती होगी!
स्कूल जाते हुए छोटे-छोटे बच्चे चौराहों पर विशाल होर्डिंग पर बेहद कम कपड़े पहने हुए लड़की को आमंत्रित करने के अंदाज में देखते हैं तो उनके कोमल मन में अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों के बारे में कैसे विचार आते होंगे? कुछ समय पहले आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल से निकलने की उम्र तक एक औसत शहरी बच्चा पर्दे पर आठ हजार हत्याएं और एक लाख हिंसक दृश्य देख चुका होता है। अठारह वर्ष का होने तक वह दो लाख हिंसक दृश्य देख चुका होता है, जिनमें चालीस हजार हत्याएं और आठ हजार स्त्री विरोधी अपराध शामिल होते हैं। फिल्मों में ‘लड़की पटाने’ के नाम पर जोर-जबर्दस्ती और छेड़खानी के कितने दृश्य वह देखता होगा, इसका तो बस अनुमान ही लगाया जा सकता है।
ऐसे विज्ञापनों की भरमार है जो किसी न किसी तरह नौजवानों के दिमागों में यह बात बैठा देते हैं कि लड़कियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा उपभोक्ता होना जरूरी है। जाहिर है, अधिकतर विज्ञापनों में लड़कियों को या तो विवेकशून्य या फिर उपभोग की वस्तु के तौर पर पेश किया जाता है। चौतरफा हावी संस्कृति के प्रभाव में बहुतेरी लड़कियां भी खुद को एक वस्तु के तौर पर सजाने-संवारने में लगी रहती हैं। रही-सही कसर ऐसे बेदिमाग मां-बाप पूरी कर देते हैं जो अपनी छोटी बच्चियों को ‘शीला की जवानी’ या ‘मुन्नी बदनाम हुई’ जैसे गीतों पर नाचना सिखाते हैं और बड़े गर्व से मेहमानों के सामने उन्हें प्रदर्शित करते हैं।
परिवारों के भीतर और पूरे समाज के स्तर पर बढ़ते अलगाव के माहौल में इस ओर ध्यान देने की फुर्सत किसे है कि बच्चों की मासूमियत छीन कर उनके दिलोदिमाग में कैसी विकृतियां भरी जा रही हैं। बच्चों के साथ बढ़ती यौन शोषण की घटनाएं भी इसी तस्वीर का दूसरा पहलू हैं। तथाकथित सूचना क्रांति ने इस सड़ांध को पूरे समाज में फैलाना आसान बना दिया है।
स्मार्टफोन और लैपटॉप पर इंटरनेट के माध्यम से अश्लील तस्वीरें और वीडियो बच्चों को बेरोकटोक उपलब्ध हैं। किसी भी स्कूल के आसपास की मोबाइल चार्ज करने वाली दुकानों से पता कीजिए, उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया है फिल्मी और अश्लील क्लिप्स की बिक्री। लखनऊ के स्कूल के वे दोनों बच्चे एक सवाल की तरह हमारे सामने खड़े हैं। बचपन का दुश्मन यह समाज कब तक इससे मुंह मोड़े रखेगा!
सत्येंद्र सार्थक