नाम उनका गोतो सान है। यहां के लिहाज से गोतो जी। जापान में किसी को उपनाम से बुलाने पर उसमें सान जोड़ते हैं, जैसे अपने यहां जी। पूरा नाम उनका हिरोमी गोतो है। केवल हिरोमी पुकारने पर कोई सान न लगाए तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन उपनाम से पुकारे जाने पर सान लगाना बेहद जरूरी है। यह उनके नाम और सम्मान दोनों के लिए जरूरी है। इस लिहाज से वहां नाम से बड़ा उपनाम होता है। एक सहकर्मी ने एक दिन उन्हें केवल गोतो कह कर क्या पुकारा कि उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। जब मामला ठंडा हुआ तब बताया कि जापान में उपनाम के साथ सान लगाना जरूरी है। मूल नाम के साथ सान बोलना कोई जरूरी नहीं है।

जापान में कोई एक दशक पहले जब भारतीय फिल्में धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही थीं, तो यही फिल्में गोतो सान को जापान से भारत खींच लार्इं और यहां रहने का पक्का मन बना। उनका अपने देश आना-जाना होता है, लेकिन असली ठिकाना भारत है। सरल शब्दों में भारत और गोतो सान ने एक-दूसरे को अपना लिया है। जापान खींचता जरूर है, पर भारत उनको जाने नहीं देता। घूमने की शौकीन गोतो सान ने एक दशक में लगभग पूरा भारत नाप लिया है। रोटी-रोजी के लिए दिल्ली ठिकाना तो बनारस प्रिय शहर है। यहां आकर हिंदी सीखी। पहले उन्हें केवल भाषा जापानी आती थी, अब बोलचाल की भाषा हिंदी है। कुछ साल पहले लंदन अंग्रेजी सीखने गर्इं, लेकिन वहां एक अनुभव ने उनका भारत प्रेम और गाढ़ा बना दिया। एक वाकया वे नहीं भूल पातीं।

रात का वक्त था और लंदन का मौसम भी काफी खराब था और अनजान शहर में अपने ठिकाने पर पहुंचने में कितना समय लगेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। रास्ते में उन्हें एक भारतीय रेस्तरां दिखाई पड़ा, जिसका शटर गिरने जा२ रहा था। तभी उसमें दाखिल होने पर हिंदी में पूछा- ‘कुछ खाने को मिलेगा क्या?’ रेस्तरां के मालिक सरदारजी थे, जिन्होंने हिंदी सुन कर ताड़ लिया कि महिला पूर्वोत्तर भारत की होगी।

फिर पूछ लिया कि नॉर्थ-ईस्ट के किस राज्य की हो! जवाब मिला कि वे जापानी हैं और दिल्ली में रहती हैं। सरदारजी इतने खुश हुए कि उनके लिए फटाफट कुछ भोजन तैयार कराया और हिंदी में बात करने के कारण बिल में करीब पच्चीस फीसद की कटौती कर दी। गोतो सान बताती हैं कि कोई भारतीय ही ऐसा कर सकता है। कोई अभारतीय रेस्तरां होता तो ज्यादा से ज्यादा कुछ खाने को देता, पर बिल बिल्कुल कम नहीं करता, जैसा कि उनका अब तक का अनुभव रहा है। ऐसी घटनाएं भारत को बाकी देशों से अलग करती हैं।

दिल्ली को अपना ठिकाना बनाने पर उन्होंने सबसे पहले एक गैर-सरकारी संगठन में नौकरी की थी जो भारत-जापान संबंधों के बीच मजबूती के लिए काम करता है। वक्त मिलने पर भारत भ्रमण। जम्मू-कश्मीर छोड़ कर वे लगभग पूरा भारत घूम चुकी हैं। कुछ समय पहले उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया है। जापान से खाद्य सामान का आयात कर उसकी दिल्ली स्थित जापानी रेस्तरां में आपूर्ति करने लगी हैं।

इसमें उनका हाथ बंटाते हैं उनके जापानी पति, जिनसे उन्होंने हाल में शादी की है। भारत की कड़क मसाला चाय उन्हें बहुत पसंद है, भले ही यहां ‘ग्रीन चाय’ का फैशन बढ़ रहा हो, लेकिन उनको कभी जापानी ‘ग्रीन चाय’ पीते नहीं देखा। भारत के विविधतापूर्ण लजीज और मसालेदार भोजन का नाम लेते ही उनका चेहरा खिल जाता है। उन्हें बस एक बात अखरती है कि भारत में समय की पाबंदी और साफ-सफाई को लेकर लोगों में जागरूकता का अभाव है।

वक्त के पाबंद देश जापान की नागरिक गोतो सान को भारतीयों की वक्त को लेकर लापरवाही की आदत हमेशा परेशान करती है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत तब होती है जब उन्हें चीनी समझ लिया जाता है। कुछ साल पहले एक बार लाजपत नगर जाने के लिए एक प्राइवेट बस में सवार होकर लाजपत नगर कह कर कंडक्टर की तरफ एक नोट बढ़ा दिया, जिसने मुनासिब टिकट न काट कर ज्यादा पैसे काट लिए। वे उखड़ गर्इं और हिंदी में बताया कि लाजपत नगर का असल किराया कितना है।

कंडक्टर भौंचक! एक यात्री ने ताना कसा कि चीनी होकर हिंदी बोल रही है। गोतो सान ने ताव में कहा कि वे चीनी नहीं, जापानी हैं। जापानियों को चीनी कहना लाल कपड़ा दिखाने जैसा होता है। यात्री को अफसोस हुआ और सबने उनके प्रति आदर का भाव दिखाया कि वे हिंदी बोल रही हैं। मुंबइया फिल्में उनका प्रिय शगल हैं, क्योंकि इन फिल्मों ने उनका भारत से परिचय कराया और काफी हद तक हिंदी भी सिखाई। उनसे बातचीत करने पर यही लगता है कि जापान उन्हें खींचता है और भारत जाने नहीं देता।