प्रेम प्रकाश

हम भी उसके साथ कदम मिलाकर चल रहे हैं। पर इतनी भी रफ्तार ठीक नहीं, कि आराम करने का मौका ही न मिले! आजकल मोबाइल और इंटरनेट का युग है। हर कोई व्यस्त दिख रहा है। अपनी निजता और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर हर कोई दूसरे की जबान बंद कर देता है। घंटों मोबाइल के सामने समय बिताना एक चलन बन गया है।

हालत यह है कि अब रिश्ते भी इसी पर ही अच्छे लगने लगे हैं। सोशल मीडिया के अलग-अलग मंच फेसबुक, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम, ईमेल आदि ने मानो यह फरमान जारी कर दिया है कि अब लोगों को आपस में प्रत्यक्ष मिलने की जरूरत ही नहीं है। आप अपने स्मार्टफोन से हर ज्ञान, मनोरंजन, भावनाएं, सुख-दुख जैसी तमाम आवश्यकताएं यों ही पूरी कर सकते हैं। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि संवेदनाएं, सहानुभूति, संवाद, सहयोग, स्वीकृति, प्यार के लिए परिवार, समाज, रिश्तों का एक विशेष स्थान है। इसकी जगह कोई भी मशीन, भौतिक चीज, मोबाइल, कंप्यूटर नहीं ले सकता है।

कुछ समय पहले एक सज्जन की पत्नी का निधन हो गया। वे बहुत दिनों से बीमार थीं। उनकी तबियत के बारे में जानकारी अक्सर सोशल मीडिया पर साझा की जाती थी। उसमें हजारों टिप्पणियां मिलती थीं। सैकड़ों लोग सलामती की दुआएं मांगते थे। यह सब देखकर उन सज्जन का जी हल्का हो जाता था। वे मानकर चल रहे थे कि उनका सोशल मीडिया का परिवार बड़ा है। सभी खुशी-गम में काम आने वाले हैं।

वे इस डिजिटल दुनिया के नए परिवार की खूब तारीफ किया करते थे। मगर जब पत्नी दुनिया छोड़ गर्इं, तो कुछ ही दोस्त सांत्वना देने उनके घर पहुंचे थे। हां, हजारों की संख्या में दुख प्रकट करती टिप्पणियां जरूर थीं, उनके फेसबुक पर। हैरानी की बात यह भी थी कि उनके दफ्तर के कुछ करीबी दोस्तों ने भी उनसे मिलना या फोन करना मुनासिब नहीं समझा। बस, सबने सोशल मीडिया का ‘धर्म’ निभाते हुए उसी मंच पर जाकर दुख प्रकट किया।

पिछले महीने की बात है। ट्रेन में महज करीब दो साल का एक बच्चा मोबाइल पर टकटकी लगाए लगातार कुछ देख रहा था। शायद वीडियो गेम या बच्चों से जुड़े कुछ वीडियो। उसके मां-पिता भी अपने-अपने स्मार्टफोन पर चिपके हुए थे। तीनों का आपस में घंटों से कोई संवाद नहीं था। दिन में आठ-नौ घंटों के सफर में पति-पत्नी ने भी आपस में बहुत कम बार बात की। वह भी कुछ ही पल। बीच में जब बच्चा कभी रोता था, तब मां उसके मोबाइल में यूट्यूब पर कोई नया चैनल बदल देती थी या बिस्कुट पकड़ा देती थी। देर-सबेर बच्चा भी डिजिटल दुनिया में व्यस्त हो जाता था।

अब सबकी नजर में ये बातें आम हो चुकी हैं। बहुसंख्यक आबादी तो इसी लत और नशे में चूर है। अब सबको सतर्क होना पड़ेगा कि डिजिटल दुनिया के जाल में फंस कर अपने समय और रिश्ते, दोनों को ही लोग खो न दें। स्क्रीन पर क्षणिक सुख तलाशने के चक्कर में जीवन के उत्पादक समय को गंवा न दें। अपने नौनिहालों के हिस्से का समय और प्यार तो किसी भी सूरत में उन्हें देना ही पड़ेगा। तभी भविष्य में ऊर्जावान और काबिल पीढ़ियां पुष्पित-पल्लवित हो सकेंगी।

बात सिर्फ यह नहीं है कि हर जानने वाले से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई ही हो। हर आदमी की परिस्थितियां अलग हैं। जिंदगी में सबकी अपनी व्यस्तताएं हैं, अलग तरह की समस्याएं हैं। लेकिन कुछ वर्षों में सोशल मीडिया की आड़ में रिश्तों का धड़ल्ले से डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जो एक इंसानी जीवन और स्वस्थ समाज के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

सही है कि डिजिटल मीडिया ने हमारा जीवन बहुत आसान बना दिया है। सूचना, ज्ञान, नई बातें आदि अनेक क्षेत्रों में क्रांति आई है इससे। पर आज हमारी नासमझी या दूसरों को देखकर नकल करने की आदत, बाजार का दबाव या कुछ और, सबने हमसे हमारी सबसे बड़ी ताकत- रिश्तों की अहमियत- को बौना साबित कर दिया है।

हर आदमी की निजी ख्वाहिश होती है कि दूसरा उसका खयाल रखे, हालचाल पूछे, मन की अनकही भावनाओं को समझे। पर दूसरों के मामले में अक्सर वही इंसान उपेक्षा का बर्ताव करता दिखता है। हमेशा ध्यान रखने वाली बात है कि संबंधों को जीवित रखने के लिए दोनों तरफ से समान पहल की आवश्यकता होती है। अफसोस कि आज हम दूसरों के हिस्से का समय स्मार्टफोन पर लुटा रहे हैं।

सोशल मीडिया का उपयोग जरूरत के अनुसार करना ही ठीक है। इसके साथ रिश्ते, परिवार, समाज की उपयोगिता को भी समझने की जरूरत है। थोड़ा ही सही, लेकिन रिश्तों में प्यार, संवाद, प्रत्यक्ष उपस्थिति और सामाजिकता का परस्पर भाव दर्शाया जाए, ताकि परदे की रंग-बिरंगी दुनिया और परदे से बाहर की सामाजिक सच्चाई और रिश्तों की अहमियत के बीच संतुलन स्थापित हो सके।