एक दिन सुबह उठने पर मैंने जब एक दोस्त से बात करने के लिए फोन लगाया तब अचानक पता चला कि मेरे मोबाइल में बचा हुआ सारा पैसा पहले ही कट चुका है। इसके लिए न कोई मैसेज न कुछ और, बस खाते से सारे पैसे गायब! मुझे हैरानी हुई कि कल रात तक सौ रुपए से ज्यादा राशि थी और यह अचानक कैसे खत्म हो सकती है! मैंने सोचा कि हो सकता है इंटरनेट के बहाने पैसे काट लिए गए हों, पर देखा तो अभी इंटरनेट का भी काफी डाटा बचा हुआ था। यानी पैसे इंटरनेट के मद में भी नहीं कट सकते थे।
ग्राहक सहायता वाले नंबर पर फोन करने के मेरे पिछले अनुभव काफी कड़वे रहे हैं। पहले मैं समझता था कि कस्टमर केयर वाले इतने मूर्ख होते हैं कि किसी भी बात को ठीक से नहीं समझते। इनसे बात करने पर सारी ऊर्जा अपनी बात इन्हें समझाने में ही खर्च हो जाती है। इसके बाद इनके वही घिसे-पिटे जवाब सुनने को मिलते हैं- ‘जी, आप निश्चिंत रहें, आपकी मदद अवश्य की जाएगी।’ कहा जाता है कि ‘क्या मैं आपकी कॉल को थोड़े समय के लिए होल्ड पर रख सकता हूं।’ यह बात होल्ड पर रखने के काफी देर बाद कस्टमर केयर अधिकारी बोलता है। वह आपको पहले कॉल होल्ड पर रखने के लिए धन्यवाद देता है। फिर कहता है- ‘जैसा कि मैं समझ पा रहा हूं…!’ आप समझाते रहते हैं, वह समझता रहता है और बीच में आपकी समस्या के निराकरण का आश्वासन देता रहता है। आप थक-हार कर उससे तौबा कर लेते हैं। आपकी समस्या जस की तस बनी रह जाती है। दरअसल, कस्टमर केयर वाले बेवकूफ नहीं हैं, बल्कि खुद बेवकूफ बने रह कर ग्राहक को बेवकूफ बनाने की कला जानते हैं।
खैर, इतना कुछ जानने-समझने के बावजूद मेरे सामने और कोई विकल्प नहीं था। सभी ग्राहक सेवा अधिकारी अन्य कॉलों पर व्यस्त थे और मेरी कॉल उनके लिए बहुत ‘महत्त्वपूर्ण’ थी, इसलिए मुझसे लगातार कॉल पर बने रहने की गुजारिश की जा रही थी! करीब पांच मिनट बाद जो ग्राहक सेवा अधिकारी उपलब्ध हुए, उनके बोलने के लिहाज से कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि ग्राहक की सेवा का भाव उनके मन को छू भी गया है। खैर, मैंने उन्हें अपनी समस्या बताई। उन्होंने मेरा फोन ‘होल्ड’ पर रख दिया। थोड़ी देर बाद उनका जवाब था कि अभी हमारे सिस्टम में ऐसी कोई सूचना नहीं दिख रही है। जब मैंने कहा कि पैसे कटने की शिकायत की स्थिति में आपका सिस्टम अपडेट क्यों नहीं रहता, तो उस कथित ग्राहक सेवा अधिकारी ने फोन काट दिया।
यह बहुत अपमानजनक था। इसके बाद मैंने इस व्यवहार की शिकायत के लिए फोन किया। काफी मशक्कत के बाद एक व्यक्ति से बात हुई तो वह मेरी शिकायत दर्ज करने के बजाय मुझे यह समझाने में लग गया कि मेरी कॉल दरअसल ‘कॉल ड्रॉप’ की वजह से कट गई। लेकिन मैंने शिकायत दर्ज करने पर जोर दिया। लेकिन उसने मेरी कॉल एक वरिष्ठ अधिकारी को ट्रांसफर कर दी। उसने फिर समझाने और मेरी जिद के बाद अगले अधिकारी को फोन ट्रांसफर कर दिया। उस अधिकारी ने भी सूचना अद्यतन नहीं होने की बात की, लेकिन पहले ग्राहक सेवा अधिकारी द्वारा फोन काटे जाने की शिकायत उसने लिख ली। इस पूरी बातचीत में करीब पैंतालीस मिनट लग गए। अब मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी। मैं हताश और निराश होकर बैठ गया। इसके अलावा, सहायता देने वाले ‘हेल्पलाइन’ नंबर तो इतने हो गए हैं कि उन्हें याद करने में ही आम आदमी असहाय हो जाता है। हर समस्या के लिए हेल्पलाइन नंबरों को ऐसे पेश किया जाता है, जैसे वे उस समस्या का रामबाण इलाज हों। पर इनकी हकीकत इससे कोसों दूर है।
दरअसल, हेल्पलाइन नंबर एक ऐसा आभासी संसार है, जहां आप अपनी समस्या सुना और बता तो सकते हैं, पर वह दर्ज की जाएगी या नहीं या फिर उस पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं, इस बारे में आप पूरी तरह लाचार हैं। खासतौर पर टेलीकॉम कंपनियों के मामले में। बहुत मेहनत करके आप ‘ग्राहक सेवा’ को ई-मेल कर सकते हैं। यही एकमात्र ऐसा तरीका है, जहां आपके पास अपनी शिकायत दर्ज कराने का सबूत होता है। मगर उसका निराकरण हो, यह यहां भी जरूरी नहीं। सवाल है कि मोबाइल क्रांति और डिजिटल इंडिया के नारे के दौर में जिस देश में सिर्फ बारह प्रतिशत लोगों की पहुंच इंटरनेट तक हो और उसमें भी सात-आठ प्रतिशत लोग इंटरनेट के सक्रिय उपभोक्ता हों, उस देश की बाकी आबादी क्या अधिकारविहीन रहेगी? मोबाइल उपभोक्ताओं की करीब पैंतीस करोड़ जनसंख्या के लिए क्या उनके प्राथमिक उपभोक्ता अधिकारों के बारे में भी चिंतित होने की जरूरत नहीं है? .. (अवनीश कुमार)
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