न कभी सोचा, न ही कभी जेहन में था कि मैं शेयर बाजार में नौकरी करूंगा। नौकरी से पहले मुझे इतना भी पता नहीं था कि शेयर बाजार होता क्या है? काम कैसे करता है? सेंसेक्स का चढ़ना-उतरना किस पर निर्भर करता है? खैर, सन 2000 में पहली दफा अवसर मिला शेयर बाजार में नौकरी करने का। सब कुछ एकदम अनजाना-अनपहचाना-सा लगा। कुछ दिनों तक तो बाजार की तकनीकी शब्दावली और भाषा ही समझ में नहीं आई। शेयरों की खरीद-बिक्री को लेकर इतने प्रकार की भाषा थी- समझ ही नहीं आता था कि ‘सौदा गिराने’ का क्या मतलब होता है और सौदा पकड़ने का क्या! उस वक्त मेरी स्थिति अजीब-सी हो जाया करती थी, जब कोई कहता कि मेरा इतने रेट का फलां-फलां सौदा ‘पलट’ दो। एकाध सेकेंड तो यही समझने में बीत जाता था कि सौदा पलटा कैसे जाता है? सौदा क्या कोई बोरी है, जो पलट दो। बहरहाल…।

दफ्तर में काफी दिनों तक इस प्रकार की समस्याओं से मुझे दो चार होना पड़ा। धीरे-धीरे शेयर बाजार, इसकी तकनीकी भाषा आदि की आदत-सी हो गई। पल-पल चढ़ते-उतरे शेयरों के भाव को देखना, अपनी ही तरह का ‘रोमांच’ पैदा करने लगा। जब शेयर बाजार के प्रति रोमांच पैदा हुआ तो फिर अपने ‘भाग्य’ को आजमाने की कवायद भी शुरू की। देखते हैं, आज के ट्रेड (सौदे) में कितना लाभ होता है, कितना नुकसान। शुरू-शुरू में तो लाभ का सिलसिला खूब चला। खूब पैसे बनाए। खूब दावतें उड़ार्इं। लेकिन बाद में जब झटके पर झटके लगने शुरू हुए तो फिर वह रकम भी पास से जाने लगी, जो वेतन के तौर पर मिला करती थी। मतलब, वेतन का आधा भाग महीने के शुरू में ही शेयर बाजार के हवाले हो जाता था।

निरंतर होते नुकसान को देख कर न मन दफ्तर में लगता था न किसी और काम में। हर वक्त निगाह स्क्रीन पर टिकी रहती थी कि अब भाव क्या आ रहा है। कितना पास से जा रहा है, कितने का नुकसान चल रहा है। दिल-दिमाग हर वक्त बेचैनी की स्थिति में रहता था। काफी दिनों तक यह सिलसिला यों ही चलता रहा। नुकसान पर नुकसान। दूसरे से उधार भी कितना लो। आखिर एक न एक दिन तो चुकाना पड़ेगा।

फिर एक दिन एक मोटे सौदे में इतनी जोर की पटकनी लगी कि उसने मुझे दिन में तारे दिखा दिए। सालों लग गए उस नुकसान की भरपाई में। उस दिन से कसम खाई कि अब कभी शेयर बाजार में डे-ट्रेडिंग (सट्टा) नहीं करूंगा। तबसे लेकर आज तक अपनी बात पर कायम हूं।

शेयर बाजार से जुड़े मुझे पंद्रह साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस बीच न जाने कितने सटोरियों को ‘बर्बाद’ होते देखा। जाने कितनों को अपनी जमीन-जायदाद तक को दांव पर लगाते देखा। उनको भी बहुत करीब से देखा, जो ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपइया’ के साथ इस अनिश्चित बाजार में दो का चार करने आया करते थे। एक दिन वे भी अपनी रकम के साथ ‘निपट’ जाया करते थे।

दरअसल, शेयर बाजार में लोग आते यह खुशफहमी लेकर हैं कि हम इससे जग जीत लेंगे। यहां से रकम दोगुनी करके ले जाएंगे। असली बाजार के पंडित हम ही हैं। और, यह बाजार हमारे ही ‘नक्कों’ पर चल रहा है। भला आज तक कौन पार पा सका है शेयर बाजार या सट्टे से। यह वह दरिया है, जहां आप जितनी रकम डालते जाएंगे, धीरे-धीरे सब डूबती जाएगी।

स्क्रीन पर चलती लाल-नीली पट्टियों का आकर्षण ही आदमी को अपनी गिरफ्त में लिए रहता है। बिरले होंगे, जो इस बाजार से रकम कमा कर ले गए हों। वरना यहां हर बंदा लुटने के लिए खुद चला आता है। अपनी इतने साल की नौकरी में मैंने इस बाजार से लोगों को कमाते कम, गंवाते ज्यादा देखा है। यहां कमा वही पाता है, जिसके पास अथाह धैर्य हो। सट्टा बाजार में धैर्य… बहुत मुश्किल काम है।

शेयर बाजार की बड़ी-बड़ी गिरावटें अब मुझे बेचैन नहीं करतीं। शेयर बाजार का कायदा है, यहां से जितना लाभ मिल रहा है, तुरंत ले लो, पर कभी दिल लगाने की गलती मत करो। क्योंकि शेयरों से अगर दिल लगाएंगे तो एक दिन यह आपके दिल को ही बैठा देगा।
यह तय है कि शेयर बाजार की हर बड़ी गिरावट बड़ा नुकसान लेकर आती है। हर बड़े नुकसान से निपटना हमारी समझदारी पर ही निर्भर करता है। जो सक्षम होते हैं, गिरावट के भंवर में से निकल आते हैं, जो नहीं निकल पाते, वे अंतत: डूब जाते हैं। यही शेयर बाजार का कायदा भी है और दस्तूर भी।

(अंशुमाली रस्तोगी)

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