पलायन की मार उत्तराखंड के गांवों में इस कदर पड़ी है कि नया राज्य बनने के बाद भी पलायन का क्रम रुका नहीं और गांवों में आमतौर पर बच्चे, वृद्ध और महिलाएं ही नजर आती हैं। अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो अर्थी को कंधा देने वाला भी मुश्किल से मिल पाता है। इसी हालत में एक बार उत्तराखंड की रानीखेत तहसील के एक गांव में एक वृद्ध की मृत्यु हो गई।
हालत यह थी कि परिवार में दाह-संस्कार करने वाला कोई नहीं था। तभी एक साधु आया और उसने अर्थी के लिए सामान जुटाया और गांव की परंपरा के मुताबिक दाह-संस्कार कर दिया। जाने से पहले साधु ने कहा- ‘एक अर्थी को कंधा देने से सात जन्मों का पुण्य मिलता है।’ एक बच्चा सतीश वहीं मौजूद था और उस पर इस बात का ऐसा असर पड़ा कि उसके बाद जब भी किसी की मृत्यु की खबर वह सुनता, अर्थी को कंधा देने पहुंच जाता और दाह-संस्कार में पूर्ण सहयोग देकर ही घर लौटता।
बाद में सतीश ने महसूस किया कि गांव-कस्बे में आर्थिक अभाव ग्रस्त ऐसे बहुत सारे परिवार हैं, जिनके पास मृत व्यक्ति के दाह-संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं। वह गरीबों और असहाय लोगों की मृत्यु की सूचना मिलते ही निस्वार्थ भाव से अर्थी के लिए खुद ही बांस काटने से लेकर दाह-संस्कार की सामग्री अपने पैसे से खरीद कर ले जाने लगा। बीमार और चोटग्रस्त पशुओं और परिंदों की मरहम पट्टी, जरूरतमंद लोगों की छोटी-मोटी परेशानी में मदद करना, बंजर जमीन में पेड़ लगाना उसका रोज का काम बन गया था। कुछ ऐसी बातें थीं, जो सतीश को दूसरे युवाओं से अलग करती थीं।
सतीश के पिता दुर्गादत्त पांडे रानीखेत सदर बाजार में एक छोटी-सी सरकारी गल्ले की दुकान चलाते थे। उनकी मृत्यु के बाद सतीश ने वह दुकान संभाली। अपनी पत्नी और दो बच्चों के लालन-पालन और पढ़ाई के साथ-साथ गरीबों और असहायों की अंत्येष्टि सहित अनेक परोपकारी कार्यों में अपनी व्यस्तता बनाए रखी। गांव में मोबाइल पहुंचने के बाद कभी-कभी जरूरतमंद लोग अपने अस्पताल के इलाज, दवाई और आॅपरेशन वगैरह के लिए भी सतीश से संपर्क करने लगे। उसने कभी किसी को निराश नहीं किया। जितनी मदद हो सकती थी, उसने की। यहां तक कि कई बार अपना खून भी उसने जरूरतमंद व्यक्ति को दिया। पर्यटन कस्बा होने के कारण वैसे पीड़ित पर्यटक भी संपर्क करने लगे, जिनका सामान, पर्स वगैरह चोरी हो गया हो।
लेकिन परोपकारी की भी अपनी क्षमता की चादर होती है। सतीश पर भी यह बात लागू हुई। पत्नी के जेवर बेच कर और बच्चों की बचत वगैरह के सारे पैसे परोपकार में लगा चुके इस परिवार के योगदान को कस्बे के कुछ लोग समझ रहे थे। उन्होंने सतीश के निस्वार्थ काम और जज्बे को देख कर कुछ आर्थिक मदद करनी चाही। इस मदद से सतीश का उत्साह बढ़ा और उसके बाद उसने जनसेवा समिति का गठन कर उसके जरिए लोगों को दवाइयां और इलाज के अलावा फल वगैरह भी बांटने लगा।
आज भी सतीश को अक्सर एक दिन में दो या तीन अर्थियों को पहाड़ी ऊबड़-खाबड़ रास्तों में कंधा देते और लावारिस सड़ी-गली लाशों को ढोकर उफनती नदियों के किनारे दाह-संस्कार करते देखा जाता है। फौजियों के दाह-संस्कार में भी सेवा-समिति की मदद ली जाती है। लेकिन नेकी सदा नेकी नहीं रहती।
उसमें भी अपने आप ही दुख पनपने लगते हैं। सतीश को तब मुश्किल झेलनी पड़ती है, जब किसी सड़क दुर्घटना में तड़प रहे पीड़ित की इलाज के लिए अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में मौत हो जाती है। ऐसे में कानून के तहत बयान दर्ज कराने या कोर्ट-कचहरी के बार-बार चक्कर काटना, उसके सरोकार के काम में रुकावट पैदा करता है।
परोपकार की सराहना और तारीफ सब करते हैं, लेकिन इसमें विरला ही कोई हाथ आगे बढ़ाता है। ऐसे लोगों के समर्पण का सम्मान हो, उनका परोपकार बर्बाद नहीं होने पाए, उनकी भलाई का उपहास न हो, यह सुनिश्चित करना समाज के साथ-साथ सरकार की भी जिम्मेदारी है। अच्छा है कि 2015 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सतीश को उसके पिछले चार दशकों के काम के योगदान को सम्मानित किया।
हालांकि इससे पहले भी सतीश को कई संस्थाओं और संगठनों की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन सतीश का असली सम्मान उन लोगों की आंखों और दिलों में साफ महसूस किया जा सकता है, जिनकी उसने वक्त पर मदद की। ऐसे लोग हमारे समाज और उसकी संवेदना को बचाए रखने के लिए कितने जरूरी हैं, यह शायद बताने की जरूरत नहीं है।
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