पिछले कुछ समय से जिस तरह पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘वृक्षारोपण’ का दौर चला है, लोग इस बारे में सोचने लगे हैं। लेकिन एक जमीनी सच्चाई की अनदेखी नहीं की जा सकती। शहरों में जितने सार्वजनिक शौचालय हैं, वे खासतौर पर महिलाओं के लिए न तो सुरक्षित हैं, न ही वर्तमान स्थिति में इस्तेमाल के योग्य हैं। आमतौर पर स्त्री और पुरुष शौचालय अगल-बगल होते हैं, बस उनका प्रवेश द्वार अलग होता है। ऐसे में ‘गलती हो गई’ कह कर गलती करने को उतारू असामाजिक तत्त्वों का क्या हो?
विदेशों में सार्वजनिक शौचालय के प्रयोग के लिए कुछ रकम चुकानी पड़ती है, जहां सारी सुविधाएं और एक कर्मचारी हमेशा उपलब्ध रहते हैं। इसी तरह हमारे यहां भी सार्वजनिक शौचालयों की उचित देखरेख और पर्याप्त इंतजाम करके सुरक्षा और गंदगी की समस्या सुलझाई जा सकती है। दूसरी ओर, हाल में गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि जहां हम रहते हैं, खाना बनता है, पूजा का मंदिर है, वहां शौचालय कैसे बनवा लें! इस सोच को कैसे बदला जाए? फिर भी शौचालय बनवाने के लिए स्थान की उपलब्धता एक प्रश्न तो है ही।
स्वच्छ भारत के सामने एक दूसरी बड़ी समस्या कचरे की है। हमारे यहां कचरे के निपटान की प्रक्रिया बड़ी जटिल है। घर का कचरा लोग घरों के सामने खुले में डाल कर निवृत्त हो जाते हैं। वहां कई दिनों तक बदबू फैलता रहता है। उसके बाद बच्चे या दूसरे कूड़ा बीनने वाले, उन्हें अलग-अलग बीनते हैं। फिर खुले ट्रकों में उसे ले जाया जाता है, जहां मुख्य कचरा घरों में वह कई चरणों में सिमटता है। जबकि इस कचरे से खाद और बिजली बनाई जानी चाहिए। विदेशों में हर सौ या डेढ़ सौ कदम पर बड़े-बड़े कई कंटेनर रखे मिलेंगे। घरों से कचरा सीधे उनमें डाल दिया जाता है। वहां से एक खास प्रक्रिया से गुजार कर उन्हें ले जाया जाता है। धातुओं के कचरे का चूरा बना कर रिसाइक्लिंग करके वह फिर से प्रयोग के लिए तैयार हो जाता है।
इस मामले में सिंगापुर को एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है।
लेकिन हमारे यहां निगम के पार्कों में सूखे पत्तों को इकट्ठा करके जला दिया जाता है या दूसरे कचरे के साथ फेंक दिया जाता है। अगर इन पत्तों को गड्ढे में डाल कर मिट्टी से ढक दिया जाए तो पौधों के लिए पत्तों की खाद तैयार हो जाती है। घरेलू रसोई में सब्जी और फलों के छिलके को भी एक मिट्टी भरे गमले में डाल कर रखने से एक-दो महीने में बढ़िया खाद तैयार हो जाती है जो घर के पौधों में डाली जा सकती है। ये छोटी-छोटी बातें हैं, जो हमारी और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इसके कई आयाम हैं- नदियों की सफाई, औद्योगिक कचरे के निपटान, रासायनिक कचरे और कार्बन उर्त्सजन की समस्या।
इसके बरक्स पार्कों में झाड़ू पकड़ कर फोटो खिंचवाने से समस्या हल नहीं होगी। नागरिक सचेत हो भी जाएं तो जब तक सरकारें इसके निपटान की सही व्यवस्था नहीं करतीं, तब तक कुछ भी बेहतर नहीं होने वाला। वृक्षारोपण की योजना पर्यावरण के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। लेकिन कौन-सा पौधा कहां लगेगा, क्यों लगेगा इसकी जानकारी भी उतनी ही जरूरी है। कहीं भी किसी तरह के वृक्ष लगा देने से कई समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। कई सोसाइटियों में तीस-पैंतीस साल पहले लगाए गए वृक्ष दैत्याकार रूप ले चुके हैं। घरों के पीछे जंगल उग आए हैं। सामने खिड़कियों या बरामदे में उनकी शाखाएं घुस आई हैं। रोशनी, हवा, धूप सब खत्म। इनकी छंटाई होनी चाहिए, पर नहीं होती।
घरों के बाहर, कम ऊंचाई वाले फलों-फूलों के वृक्ष लगाए सकते हैं। हिब्सिकस, कचनार, नींबू, अनार, पपीता, बाटल ब्रश आदि के वृक्ष सुंदर भी लगते हैं और अधिक फैलते भी नहीं। गुलमोहर, देवदार, जामुन, पीपल, बरगद, सप्तपर्ण, सेमल, अशोक आदि के वृक्ष घरों के नजदीक नहीं लगाने चाहिए। पहले के खुले घरों में नीम का पेड़ होता था। अब ऐसा संभव नहीं। हमारे यहां बरगद, पीपल, नीम, तुलसी आदि की पूजा की जाती है। इसके पीछे इन पेड़-पौधों के औषधीय गुण हैं, जिनमें स्वस्थ जीवन में सहायता मिलती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
पीपल एक ऐसा वृक्ष है, जो रात में भी ऑक्सीजन का विर्सजन करता है।
जहां तक दिल्ली का सवाल है, यहां की अधिकतर आबादी जिस तरह के घरों में रहती है, वहां रोशनी, धूप या हवा सीधी नहीं आती। कभी दीवार, कभी छत तो कभी पेड़ों के बीच से होकर आती है। दरअसल, वहां बड़े ऊंचे और फैलने वाले वृक्ष लगाए गए, जिससे अब समस्या उत्पन्न हो रही है। इन समस्याओं का समाधान, सही जानकारी होना भी है, जिसे इन अभियानों का हिस्सा होना चाहिए।
कमल कुमार