महानगरों की बात अब पुरानी हो गई। अब तो बाकी शहरों के बारे में भी इस तरह मिथक कायम हो गए हैं कि वहां लोग एक-दूसरे से अनजान हो गए हैं। बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है, यह भी पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति को पता नहीं होता। कब कौन आता है और कब जाता है, इसकी खोज-खबर भी कोई नहीं लेता।

किसी के सुख-दुख से किसी का कोई लेना-देना नहीं होता। जब किसी के घर में कभी किसी कारण से पुलिस या टीवी चैनल वाले पहुंचते हैं, तब मालूम होता है कि यह फ्लैट या घर किसका है और वह क्या करता है! अक्सर ऐसे विषय पर बनने वाली फिल्मों और लेखकों ने इस मिथ को स्थायी रूप दे दिया है। लेकिन क्या यह एक अतिवाद नहीं है?

मुंबई के उपनगर मीरा रोड की एक इमारत में एक दिन दो बजे रात को एक घटना हुई। गायक और उद्यमी नवीन श्रीवास्तव के बीमार और वृद्ध पिता बाथरूम जाते समय फिसल कर गिर गए और तत्काल बेहोशी की हालत में पहुंच गए। वह दरअसल हार्ट अटैक था। नवीन और उनकी पत्नी रेखा पर अचानक खड़ी हुई इस स्थिति ने ऐसा असर डाला कि वे सदमे में आ गए।

उनकी छोटी-सी बेटी के चेहरे पर डर का साया स्पष्ट दिखने लगा। वह कभी अपनी मां को देखती तो कभी पिता को। पति-पत्नी समझ नहीं पा रहे थे कि इस आधी रात में किसको बताएं! अगर किसी को बता भी दें तो कौन अपने बिस्तर को छोड़ कर इस समय मदद के लिए आएगा।

लेकिन बेहोश पिता को तुरंत अस्पताल ले जाना भी जरूरी था, इसलिए अपने एक करीबी को उन्होंने फोन कर बुला लिया। लेकिन वक्त तब तक इतना गुजर गया था कि अस्पताल में उनके पिता को डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। लौटते हुए वे सोच रहे थे कि रात किसी तरह गुजार देते हैं, सुबह अड़ोस-पड़ोस को बताएंगे।

लेकिन मन पर दुख का जो पहाड़ टूट कर आ गिरा था, वह बेचैन करने लगा था। उन्होंने एक-दो लोगों को फोन कर पिता के बारे में बता दिया। दस मिनट लगा होगा आने में। उन्होंने देखा कि चालीस-पचास स्त्री-पुरुष और बच्चे गेट पर बेचैनी से टहल रहे हैं। उन्हें लगा कि कुछ और बात तो नहीं हो गई। किसी के घर चोरी-डकैती हो गई क्या? मन में एक नया डर घर कर गया।
दरअसल, हुआ यह था कि एक फोन के बाद हर घर के फोन की घंटी बज उठी थी। हर किसी ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए दुखद समाचार को एक-दूसरे के साथ साझा किया। वााट्स-अप पर समाचार घूमने लगा।

उतने कम समय में ही इतने लोग आ गए। उनमें कुछ तो ऐसे थे जिन्हें नवीन ने देखा जरूर था, लेकिन अब तक उनसे कोई बातचीत नहीं थी। कुछ को तो वे पहली बार देख रहे थे। जाहिर है, वह पल भावुकता से भर गया था। हर हाथ मदद के लिए उठ गया था।

उस तेरह दिन के शोक में ऐसा कोई दिन नहीं रहा होगा, जब लोग उनके घर चाय, नाश्ता, खाना पूछने न आए हों। उनमें बिहार, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे तो मराठी, गुजराती, दक्षिण भारतीय, सिंधी, पंजाबी, राजस्थानी भी शामिल थे। सभी खयाल रख रहे थे। नवीन को मना करना पड़ता था कि खाना बर्बाद हो रहा है।

इसके साथ-साथ शहर को लेकर जो धारणा उस परिवार के मन में थी, वह टूट रही थी। वे हैरानी से समझने की कोशिश कर रहे थे। क्या वे अब तक गलत थे या समय बदल गया है? तब बहुत सारे लोगों की मौजूदगी में नवीन श्रीवास्तव ने अपनी मां की मृत्यु के समय का सच बताया। उनकी मां छपरा के पास एक गांव में रहती थीं।

वहीं उनकी मृत्यु हुई। मुंबई और पुणे में रह रहे उनके दोनों बेटे अगले दिन पहुंचे। अमेरिका से उनकी बेटी आई। तेरह दिन के शोक में चूल्हा जलाने को लेकर कुछ मान्यता है। सबको चाय की तलब होती थी। पड़ोस के किसी परिवार से गुजारिश की जाती थी, तब चाय आती थी।

खाने-पीने लेकर परेशानी अलग थी। लेकिन मुंबई जैसे शहर में जब कोई उम्मीद नहीं की जा रही थी, वहां सचमुच यह हैरान कर देने वाली स्थिति थी कि नवीन को हर चीज के लिए मना करना पड़ रहा था। आसपास के लोग अपनी संवेदनाओं के साथ नवीन के साथ थे।

अगर इस घटना को ध्यान में रखें तो मुझे सोचना यह पड़ रहा है कि शहर से जिस अपनेपन के खोने की बात कही जा रही है, वह सच है या अब तक शहरों की मानी जाने वाली यह बीमारी गांव में फैल रही है और वहां से संबंध गायब हो रहे हैं!

(आनंद भारती)