बिहार में मतदान के लिए लंबी कतारों में लगी महिलाओं को देख कर यह कौन कह सकता है कि ताजा हवाओं ने उनकी जिंदगी की राहें नहीं बदलीं। धीमी आवाजें, पदचाप और असंख्य नंगे पांव जब वोट देने के लिए आगे बढ़ रहे थे तो इतिहास बदल रहा था। राजनीति में महिलाओं को हाशिये पर धकेलने वाले सभी राजनीतिक दलों के लिए इस बार का बिहार विधानसभा का चुनाव सबक है। वे अब यह मानने को मजबूर हैं कि महिलाएं जिनके पक्ष में होंगी, सत्ता की बागडोर उसके हाथों में। बिहार विधानसभा के पांच में अब तक हुए दो चरणों में पुरुषों की तुलना में पांच प्रतिशत अधिक यानी 59.5 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया। आंकड़े बताते हैं कि 1962 के चुनाव में राज्य की सिर्फ बत्तीस प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले थे। 1985 तक यह औसत बढ़ कर पैंतालीस प्रतिशत हो गया। 2009 के लोकसभा और 2010 के विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में महिलाओं की भूमिका अहम थी। नीतीश कुमार की ताजपोशी नहीं होती, अगर दोनों चुनाव में महिलाओं ने जम कर वोट नहीं दिया होता।

दरअसल, संसदीय राजनीति की इस लंबी परंपरा ने महिलाओं को भी सतर्क और परिपक्व किया है। तेजी से बदल रहे घटनाक्रम में बिहार में महिलाएं, मुसलमान, पिछड़ी और दलित जातियों की भूमिका किसी भी पार्टी की जीत और हार के लिए निर्णायक हो सकती है। राज्य में महिला वोटरों की संख्या तीन करोड़ ग्यारह लाख सतहत्तर हजार छह सौ उन्नीस है। लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी मुसलमानों की है। ऐसे हालात में बिहार के चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

जाति, धर्म और अवसरवाद से अलग एक साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाली सभी पार्टियों में से वाम दलों को छोड़ कर सबने जाति और धर्म को ही वोट का आधार बनाया है। फिर भी यह माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में युवाओं का रुझान और महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। इसलिए महिलाओं के लिए बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। कुछ वादे नीतीश कुमार ने पहले भी पूरे किए हैं। पंचायतों में मिले पचास प्रतिशत आरक्षण ने महिलाओं को राजनीति में प्रवेश के दरवाजे खोले। इसके बावजूद महिलाएं जानती हैं कि मौजूदा राजनीति में जिस तरह पैसों और ताकत का बोलबाला है, उसे निपटना आसान नहीं होगा।
बिहार की राजनीति में मंडल और कमंडल के प्रवेश के बाद एक नए दौर की शुरुआत हुई। नब्बे के चुनाव में महिलाओं के वोट में 1985 की तुलना में आठ प्रतिशत इजाफा हुआ। उस दौर में बड़े पैमाने पर ग्रामीण महिलाएं वोट डालने निकलीं। यह पिछड़ी जातियों की गोलबंदी का असर था। सत्ता बदलने में महिलाओं की भागीदारी रही। 1990 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई थी। तब लालू प्रसाद सत्ता में आए थे और बिहार की राजनीति में पिछड़ी-दलित जातियों और महिलाओं को आवाज मिली थी। लेकिन आज भी चुनावों में आधी आबादी का आधा ही हिस्सा अपने मताधिकार का उपयोग कर पाता है।

राजनीति के प्रति उनकी दिलचस्पी कम होने पीछे हमारा पितृसत्तात्मक समाज है, जो नहीं चाहता कि महिलाएं राजनीति में आएं। यह समाज डरता है कि अगर स्त्रियों के हाथों में सत्ता होगी तो उन पर शासन करना मुमकिन नहीं रह पाएगा। बीसवीं सदी से लेकर आज तक बिहार सहित देश भर में चल रहे तैंतीस प्रतिशत आंदोलन का क्या हश्र हुआ है, यह हम सब जानते हैं। जाहिर है, महिलाओं की असली चुनौती है सत्ता में वैसी सरकार का आना जो उनके मुद्दों के प्रति संवेदनशील हो। उन पर हो रही हिंसा कम हो, उन्हें जीने, पढ़ने, कपड़े पहनने, प्रेम करने की आजादी हो। वे जानती हैं कि सामाजिक स्थितियां राजनीतिक घटनाक्रमों की रफ्तार से नहीं बदलतीं। वर्गों और विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में बंटे समाज में स्त्री की हालत इसलिए भी बुरी है कि वह इन विभेदों के साथ-साथ पितृसत्तात्मक समाज को भी झेल रही है।

आजादी के बाद देश में जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है। उसने घर और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। स्त्री जानती है कि भिन्न-भिन्न वर्गों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों से चाहे कुछ भी नहीं मिला हो, पर वह लड़ रही है। अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश रही है। यह बात राजनीतिक दलों ने भी समझा है और वे महिला वोटरों को आकर्षित करने के लिए नए पैकेज के साथ चुनाव मैदान में हैं। वे जानते हैं इनका वोट उन्हें सत्ता में ला सकता है और सत्ता के बाहर भी कर सकता है। महिलाएं भी अपनी ताकत को पहचान रही हैं। यही वजह है कि आज महिलाओं ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है। वे जानती है कि राजनीतिक ताकत के बगैर महिलाओं के हिस्से का आसमान उन्हें नहीं मिलेगा।
नवोदिता