क्षमा और सहिष्णुता के बीच जो अंतर्संबंध हैं, उनकी पहचान कठिन है और सुगम भी। पर उनको निजी व्यवहार में उतार लेना दुष्कर कार्य है। अगर इनके अंतर्संबंधों को हमने पहचान लिया है, तब व्यवहार में भी उतारना सरल हो सकता है। कष्ट-सहिष्णुता एक बात है और स्वभावगत सहिष्णुता अलग स्थिति है।
शीत-ताप, भूख-प्यास या शारीरिक रुग्णता से पैदा होने वाले कष्टों को सहने की क्षमताएं सबकी अलग-अलग हो सकती हैं। इनको सह पाना या न सह सकना सहिष्णुता की महत्त्वपूर्ण कोटि में होते हुए भी इसे बाह्य स्थिति ही माना जा सकता है। यह परिस्थितिजन्य कम और स्वभावगत अधिक है। मन:स्थितिजन्य सहिष्णुता अंतश्चेतना के जाग्रत होने से ही संभव है। ऐसी सहिष्णुता जब सध जाती है, तभी क्षमाशीलता संभव है। इसीलिए कहा गया है कि क्षमा और सहिष्णुता के बीच गहरे अंतर्संबंध हैं।
हर व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से सौम्य आचरण की अपेक्षा करता है। लेकिन वह तभी संभव है, जब क्षमा और सहिष्णुता की भावना दोनों ओर प्रकट हो। ऐसी भावना दोनों ओर प्रकट होना निश्चय ही आदर्श स्थिति होती है। पर हम देखते हैं कि इस दौर में ऐसी आदर्श स्थिति दुर्लभ है। इसलिए यह जरूरी है कि समाज का संवेदनशील वर्ग इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करे कि सामाजिक स्तर पर एक सहिष्णु और समरसता-भरा समाज निर्मित हो सके। निश्चय ही यह अंत:स्फूर्त स्थिति है। हम परिवर्तन और परिमार्जन की संभावना से इनकार नहीं कर सकते।
हम जानते हैं कि असहिष्णुता से शक्ति और सहनशीलता का ह्रास होता है। व्यक्ति का सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टिकोण नष्ट होता है और आखिरकार जो अकूत क्षमता है, उसका यथोचित इस्तेमाल नहीं हो पाता। इसका खमियाजा व्यक्ति को खुद तो उठाना पड़ता ही है, इससे होने वाली सामाजिक क्षति भी नहीं रोकी जा सकती। इसीलिए यह जरूरी है कि अपने निजी व्यवहार में हम सहिष्णु बनें। सहिष्णुता के प्रशिक्षण और प्रयोग भी सलक्ष्य होने चाहिए।
हम श्रीमद्भगवदगीता को देखें या गांधी के सत्य के प्रयोगों को और कुरान या किसी अन्य शास्त्र को- सहिष्णुता और क्षमा के प्रसंग पर सभी जगह एक मिलती-जुलती राय हमारे सामने आती है। क्षमा और सहिष्णुता के आ जाने से क्रूर और दंभी स्वभाव के लोगों के हृदय-परिवर्तन की कई घटनाएं हमारे सामने हैं। इन सबसे यह साफ है कि क्षमा और सहिष्णुता के मध्य अविभाज्य संबंध हैं और ये एक-दूसरे के पूरक हैं।
इसलिए क्षमा और सहिष्णुता को समाज की आधार-भित्ति बनाने की जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करने का सहज और सर्वोत्तम स्थल हमारे शिक्षण संस्थान हो सकते हैं। उच्च शिक्षा के स्तर पर जिस तरह आज तकनीकी शिक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया जा रहा है, वैसा ही जोर प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर क्षमा और सहिष्णुता के प्रशिक्षण पर भी दिया जाना चाहिए। इस बात पर गहन मंथन की जरूरत है। शिक्षा से जुड़े संगठनों के लिए इस दिशा में सोचना जरूरी है।
शिक्षा से जुड़े अनेक अवसर हमारे सामने से गुजरते हैं। हाल ही में शिक्षक दिवस (5 सितंबर), अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस (8 सितंबर) और हिंदी दिवस (14 सितंबर) हमने मनाया है। हर वर्ष ये सभी दिवस जिस तरह से मनाए जाते हैं, हमारी उम्मीद होती है कि वैसा ही सब-कुछ होता रहे। पर कुछ ऐसा भी होना चाहिए जिससे एक बुनियादी मार्ग प्रशस्त हो सके। ऐसे दिवसों को अगर कुछ सारभूत बिंदुओं पर केंद्रित किया जाए और समसामयिक स्थितियों से जोड़ा जाए तो उनका महत्त्व द्विगुणित हो सकता है। इस दृष्टि से शिक्षा से जुड़े संस्थान और संगठनों को विचार करना चाहिए।
क्षमा और सहिष्णुता- ये दो ऐसे तत्त्व हैं जो अनेक मानवीय दुर्बलताओं से मनुष्य को मुक्त रख सकते हैं और मैत्री या मैत्री की भावना को भी सुदृढ़ बना सकते हैं। समरसता और परस्परता, सह-जीविता, सौहार्द और वैयक्तिक निर्मलता का विकास भी क्षमा और सहिष्णुता के माध्यम से संभव हो सकता है।
क्षमा और सहिष्णुता की एक साधना जैन-मत में प्रतिवर्ष होती है। इस वर्ष भी आठ दिन की साधना का पर्युषण-पर्व 10 से 18 सितंबर के बीच चल रहा है। अपेक्षा है कि यह पर्व एक ओर अपने दायरों को व्यापक बनाए, तो दूसरी ओर आठ दिन की साधना आखिरकार हमारे दैनंदिन तक विस्तार भी करे। आखिरकार क्षमा और सहिष्णुता केवल कुछ दिनों के लिए मूल्यवान नहीं हैं। इनकी मूल्यवत्ता अनवरत और निरंतर परिलक्षण में आनी चाहिए। पर्युषण-पर्व, संवत्सरी और क्षमापना दिवस की सार्थकता इसी बात में निहित है कि क्षमा और सहिष्णुता हमारे आचरण और व्यवहार का सहज अंग बनें। हमें इस ओर अग्रसर होना जरूरी है।
