बात है साल 1990 की। उस वक्त राजेश कुमार सिंह की उम्र महज 6 साल थी। क्रिकेट खेलने के दौरान एक दिन एक तेज गेंद उनकी आंख पर जा लगी थी। राजेश कुमार को गंभीर चोट आई । सबसे बड़ी बात यह हुई कि उनकी आंखों की रौशनी कम उम्र में ही चली गई। राजेश कुमार सिंह का पूरा परिवार इस हादसे से दुखी हो गया। कई लोगों को राजेश का भविष्य अब अंधकार में नजर आने लगा।

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लेकिन कहते हैं कि अगर इंसान अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना ले तो उसे जीवन में सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। आंखों की रौशनी जाने के बाद राजेश को थोड़ी दिक्कतें तो जरूर हुईं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कड़े संघर्ष से वो सफलता हासिल की जो एक मिसाल है।

आज हम बिहार के एक होनहार की चर्चा कर रहे हैं जिसने जिंदगी की तमाम मुश्किलों को पार कर आसमान की बुलंदियों को छुआ। पटना के रहने वाले राजेश का पैतृक गांव जिले के धनरूआ प्रखंड में स्थित है। राजेश के पिता रवींद्र कुमार सिंह पटना सिविल कोर्ट में अधिकारी हैं।

राजेश कुमार की खासियत यह थी कि वो बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में जहां मेधावी थे तो वहीं खेल-कूद में भी वो अव्वल रहे। आंखों की रौशनी जाने के बाद राजेश ने ब्रेल लिपि से पढ़ाई-लिखाई शुरू की। दिलचस्प यह कि जिस क्रिकेट ने उनकी जिंदगी में अंधेरा लाया था वो उस क्रिकेट से अब भी बेइंतहा मोहब्बत करते थे लिहाजा उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट खेलना भी जारी रखा। वो दृषि्टबाधित क्रिकेट खेलने लगे।

राजेश सिंह के पिता चूंकि एक अधिकारी थे इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई कायदे से शुरू हुई। उन्हें देहरादून के मॉडल स्कूल में भेजा गया। कॉलेज की पढ़ाई के लिए वे दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचे। डीयू से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जेएनयू में प्रवेश के लिए इंट्रेस टेस्ट दिया। सफल रहे। यहां उन्होंने इतिहास विषय में एमए की डिग्री ली। फिर वहीं से जेआरएफ करन लगे।

बताया जाता है कि जेएनयू में ही राजेश कुमार को सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठने की प्रेरणा मिली। साल 2006 में वो यूपीएससी की परीक्षा में शामिल हुए। इस परीक्षा में वो दिव्यांग श्रेणी में तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन फिर भी उन्हें आईएएस नहीं मिला। कहा गया कि शत-प्रतिशत नेत्रहीन होने की वजह से राजेश कुमार सिंह को यह पद नहीं दिया जा सकता।

लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद दिसम्बर 2010 में राजेश को भी नियुक्ति पत्र मिल गया। राजेश के पक्ष में फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, आइएएस अधिकारी होने के लिए दृष्टि से अधिक दृष्टिकोण की जरूरत है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार ने राष्ट्रीय क्रिकेट में भी अपना सिक्का जमाया। वे अच्छे गेंदबाज थे। नेत्रहीन भारतीय क्रिकेट टीम के वे नियमित सदस्य रहे। उन्होंने 1998, 2002 और 2006 के नेत्रहीन विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।