रियो ओलंपिक में देश की बेटियों ने बावजूद तमाम दिक्कतों और बाधाओं के, भारत की थोड़ी-बहुत लाज रख ली। इसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। खैर, अब तो पीठ ठोंकने की होड़ का दौर है और भारतीय प्रदर्शन के मूल्यांकन का भी। तमाम राज्य सरकारें और केंद्र सरकार के कुछ संगठन और विभाग इस काम को बखूबी अंजाम देने में लगे हैं और ऐसा करते हुए वे फोटुओं में खुशी से फूले नहीं समाते दिख रहे हैं। भारत की यह प्रतिक्रिया ही साबित करने के लिए काफी है कि देश में खेलों के नाम पर क्या चल रहा है। नेताओं ने कोई प्रश्न कहीं नहीं उठाया कि सवा करोड़ आबादी वाला देश ओलंपिक में ऐसा शर्मनाक प्रदर्शन क्यों करता है? प्रधानमंत्री ने इस पर कोई बैठक नहीं बुलाई कि ओलंपिक में भारत के अफसोसनाक प्रदर्शन के कारणों की समीक्षा की जाए। स्टेडियमों और खेलकूद पर होने वाले खर्चों पर तो शायद कैग भी ठीक से नजर नहीं डालता कि वहां सरकारी पैसे का कैसा और किस-किस तरह से उपयोग किया जा रहा है। जितना भी पैसा आबंटित होता है वह कहां जाता है और उसका हासिल क्या है?

दरअसल, अब हमें बिना संकोच यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमारे देश में खेल संस्कृति दूर-दूर तक नहीं है। आए दिन खिलाड़ी आरोप लगाते रहते हैं कि उन्हें शासन-प्रशासन से कोई उल्लेखनीय मदद नहीं मिलती, लेकिन उस तरफ शायद किसी का ध्यान ही नहीं जाता। ओलंपिक के इर्द-गिर्द तीन महीनों तक खेलकूद पर थोड़ी-बहुत चर्चा होती है और उसके बाद सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। सच तो यह है कि हमारे देश में खेल से जुड़े संगठनों, विभागों और मंत्रालयों पर या तो राजनीतिक हस्तियों का कब्जा है या फिर ऐसे लोगों का, जिनका खेलों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। पेशेवर खिलाड़ी तो शायद ही कहीं निर्णायक भूमिका में नजर आते हों। इसके मद््देनजर केंद्र सरकार को एक ऐसे उच्चस्तरीय आयोग का गठन करना चाहिए जो खेल सुविधाओं, आम बच्चों और युवाओं तक उनकी पहुंच, बजट और आर्थिक संसाधनों की उपस्थिति, खेल संगठनों व विभागों के प्रशासनिक ढांचों आदि की व्यापक समीक्षा करते हुए एक साल के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर खेलों में सुधार के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करे। इस आयोग के लगभग चालीस प्रतिशत सदस्य पेशेवर प्रतिष्ठित खिलाड़ी होने चाहिए।

खेल संगठनों व प्राधिकरणों में राजनीतिक व्यक्तियों की सदस्यता पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाते हुए इन्हें पर्याप्त स्वायत्तता दी जानी चाहिए। यह प्रशासनिक व रणनीतिक काम सिर्फ विश्वस्तरीय पेशेवर खिलाड़ियों के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। खेलों पर होने वाले खर्चों की समीक्षा करते हुए इनका बजट बढ़ाया जाना चाहिए। देश को 2030 में ओलंपिक का आयोजन अपने यहां कर पाने लायक ढांचा तैयार करने का लक्ष्य लेकर चलना चाहिए। दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव, आगरा जयपुर शहरों को आपस में जोड़ते हुए इसे एक ओलंपिक आयोजन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को खेल भत्ता दिया जाना चाहिए और वार्षिक स्तर पर उनके प्रदर्शन व प्रगति के आधार पर समीक्षा की जानी चाहिए।
’घनश्याम कुमार ‘देवांश’, नई दिल्ली