हमारे राजनेता जब मंच से भाषण देते हैं या अपने दल का घोषणापत्र, विज्ञापन या कोई दस्तावेज जारी करते हैं तो आदर्श वाक्यों और सद्विचारों की झड़ी लगा देते हैं। उस समय ये देवता से भी ज्यादा पवित्र, उदार, कल्याणकारी, मसीहा नजर आते हैं, दुनिया की हर संभावित अच्छाई केवल और केवल इनके यहां दिखाई देती है। अगर यह सब सच होता तो हम स्वर्ग से बेहतर जगह में होते।
मालूम नहीं किस मजबूरी में हम राजनेताओं के फरेब और आपराधिक आचरण को ढोने के लिए अभिशप्त हैं। अभिनेता सलमान खान कृष्णमृग को मारने के आरोपी हैं। वे अपनी महंगी कार से गरीबों को कुचल कर मारने का अपराध करने के बावजूद इतने प्रभावी और सम्मानित हैं कि ‘जनकल्याण’ करने वाले राजनेता उनकी कृपा के लिए लालायित हैं।
जनसत्ता, 27 मई की खबर ‘अब मंडी में सलमान को भुनाने की कोशिश’ के अनुसार हिमाचल प्रदेश के कद्दावर नेता सुखराम का परिवार सलमान की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश कर रहा है जिसमें उन्हें लेशमात्र संकोच नहीं हुआ।
वहां के मंत्री अनिल शर्मा अपने बड़े बेटे के राजनीतिक पदार्पण के लिए सलमान खान को भुना रहे हैं। एक मंत्री के लिए अदालत से सजा पाए अभिनेता की नजदीकी परेशान न करके प्रतिष्ठा का सबब बनी है। ऐसे नेताओं को, उनके पाखंड को हम कब तक और किस खुशी में ढोते रहेंगे?
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल</strong>

