कैसे विरोधाभासी युग में हम लोग जीने को अभिशप्त हैं! रविवार को जिस समय हमारे प्रधानमंत्रीजी ‘मन की बात’ के तहत युवाओं को विज्ञान में रुचि बढ़ाने और विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे, शिशुओं और माताओं की मृत्यु दर पर नियंत्रण करने, पौष्टिक आहार की उपलब्धता और आवश्यकता पर बल दे रहे थे, गुजरात में आरक्षण को लेकर हुई हिंसा पर दुख व्यक्त कर रहे थे और सूफीवाद की परंपरा पर भाषण दे रहे थे लगभग उसी समय उसी दल, जिससे हमारे प्रगतिशील प्रधानमंत्री आते हैं, के एक आनुषंगिक संगठन के हमलावर एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी, विद्वान वामपंथी विचारक और अंधविश्वास के विरोध में आंदोलन चलाने वाले एमएम कलबुर्गी को गोलियों से भून रहे थे।
लगभग 67 वर्ष पहले गांधी की हत्या से शुरू हुआ सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। पिछले साल दाभोलकरजी की हत्या भी ऐसे ही कर दी गई थी। ऐसी हत्याएं करने वाले सिरफिरे कब समझेंगे कि गोलियों से शरीर समाप्त किया जा सकता है, मस्तिष्क को मारा जा सकता है लेकिन उसमें पलने वाले विचारों को नहीं। बल्कि ये विचार क्रमश: और प्रासंगिक होते जाते हैं।
विपुल प्रकर्ष, इलाहाबाद
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