बिहार विधानसभा चुनाव में सभी वामपंथी पार्टियां एकजुट होकर मैदान में थीं और दावा किया जा रहा था कि वे तीसरा विकल्प बनेंगी। लेकिन परिणाम देखने के बाद साफ हो गया कि उनका जनाधार खिसकते-खिसकते मट्ठी भर रह गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे चुनाव में जितने लोगों ने नोटा बटन का प्रयोग किया उससे भी कम, महज एक से डेढ़ प्रतिशत लोगों ने वामपंथी पार्टियों को वोट दिया। ऐसे में यह बिंदु विश्लेषण करने योग्य है कि वामपंथी विचारधारा से लोगों का मोहभंग क्यों हो रहा है? आम लोगों, किसानों और मजदूरों के हित में खड़ा होने वाले दलों से आम लोगों, किसानों और मजदूरों ने ही मुंह क्यों मोड़ लिया है?
दरअसल, वामपंथी नेताओं की सबसे बड़ी गलती यह है कि वे जनता का मूड नहीं पढ़ते, या पढ़ते हैं तो समझ नहीं पाते। चाहे ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की बात हो, किसी गठबंधन के साथ जाने या न जाने को लेकर सही निर्णय का सवाल हो, सभी जगह ऐसी गलतियों के बाद पछतावे के शब्द! राजनीति में ‘भूल’ जैसे शब्दों की जगह नहीं होती। एक बार चूक गए तो फिर आपको संभलने का मौका नहीं मिलेगा। इस बार भी वामपंथियों से महाचूक हुई है। इसे अब धीरे-धीरे कई नेता मानने भी लगे हैं। राजद, जद (एकी) और कांग्रेस के गठबंधन के साथ यदि वामपंथी दल भी होते तो शायद भाजपा की हालत और खराब होती और वामपंथी दलों को कुछ फायदा ही होता।
जिस तरह से कांग्रेस की सीटों में लगभग सात गुना वृद्धि हुई, संभव था वामपंथी दलों को भी फायदा पहुंचता। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि अगर भाजपा की सरकार बनती तो मौजूदा हालत में वामपंथी भी इसके लिए जिम्मेवार होते। यह जनता का मूड ही था कि प्रचंड बहुमत के साथ महागठबंधन को जीत दिला कर दम लिया। समझ नहीं आता कि इस बार के विधानसभा चुनाव में वामपंथियों ने यह एलान किस आधार पर किया कि वे अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे? जब दम ही नहीं बचा हो तो लड़ना कैसा? बिहार में जब इनकी मजबूत पकड़ थी, करीब दो दर्जन से अधिक सीटें जीतते थे तब ये राजद जैसी पार्टियों से समझौता कर चुनाव लड़ा करते थे और जब शक्ति न के बराबर बची तो अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात करते हैं!
आज जब देश में सहिष्णुता के माहौल की समाप्ति की बात होती है, पांच प्रतिशत से अधिक महंगाई दर की बात होती है, पुरस्कार लौटाना जारी है, भाजपा के विरोध में गठबंधन बन रहे हैं तो उनमें शामिल न होना कहां की समझदारी है! शुरू से वामपंथियों ने भाजपा को शत्रु नंबर एक माना है। ऐसे में महागठबंधन के साथ नहीं जाना मतदाताओं के मूड को न पहचानना ही कहा जाएगा। इस तरह के अदूरदर्शी निर्णय ही इनके जनाधार को कमजोर कर रहे हैं। इन कारणों को अब तक वामपंथी क्यों नकारते आए हैं, इसकी पड़ताल जरूर पार्टी के अंदर होनी चाहिए।
’अशोक कुमार, तेघड़ा,
