अति सर्वत्र वर्जयेत। यह हिदायत सोशल मीडिया और इंटरनेट के संबंध में बिल्कुल सटीक बैठती है। आज विश्व की अधिकतर आबादी इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय है और उसके रिश्ते भी उसी दुनिया के इर्द-गिर्द बनते-बिगड़ते हैं। यह आभासी दुनिया ही उन्हें वास्तविक प्रतीत होती है जिसके परिणामस्वरूप वे वास्तविक मित्रों-संबंधियों के बजाय अपने ‘डिजिटल मित्रों’ से सुख-दुख बांटना शुरू करते हैं। हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है।
मित्र बनाना अच्छी बात है, पर समस्या तब पैदा होती है जब दुख या खुशी के क्षणों में हमें अपने मित्रों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तब न हमारे पास कथित आभासी मित्र होते हैं और न असली मित्र। इस स्थिति में व्यक्ति घोर निराशा के दौर से गुजरता है और तनावग्रस्त हो जाता है क्योंकि उसकी उम्मीदें टूटती हैं। इसका असर उसके भविष्य और वर्तमान दोनों पर पड़ता है। इस विकट समस्या का हल वास्तविक मित्रों की सोहबत में ही मिलेगा न कि आभासी संसार में।
प्रशांत तिवारी, जौनपुर
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