पर्यावरण में जिस तरह प्रदूषण का जहर घुल रहा है उससे जीवन की प्रत्यास्था घट रही है। ऐसे समय में शीर्ष अदालत की चिंता जायज है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकड़ों में देश की राजधानी दिल्ली को विश्व का सबसे प्रदूषित शहर घोषित किया गया है।
दिल्ली की आबोहवा में प्रदूषण का स्तर एशिया के अन्य घनी आबादी वाले शहरों से अधिक है। स्वयंसेवी संस्था सीएसई के आंकड़ों से पता चलता है कि प्रदूषण की प्रमुख वजह सार्वजनिक परिवहन की अपर्याप्तता और निजी वाहनों का अधिक उपयोग है। वैश्विक आंकड़े भी बताते हैं कि भारत में मृत्यु का पांचवां कारण वायु प्रदूषण है।
कड़वा सच यह है कि नगरों में वाहनों की तेज रफ्तार ने जिंदगी को धीमा कर दिया है। गौरतलब है कि भारत की आबादी का पैंतीस फीसद हिस्सा शहरों में रहता है। यह शहरी वर्ग सकल घरेलू उत्पाद का छह फीसदी पैदा करता है। दुनिया के कुल बीस में से सबसे अधिक आबादी वाले पांच शहर भारत में हैं। देश के कुछ शहरों को छोड़ दें तो सभी नगरों का जहरीली हवा में दम घुट रहा है। देश को विकास तो चाहिए, पर साफ हवा, शुद्ध पानी जैसी मूलभूत जरूरतों की कीमत पर नहीं।
पवन मौर्य, लंका, वाराणसी</strong>
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