राजनीति और नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना टेढ़ी खीर होती है। अब देखिए ना, खुद को भ्रष्टाचार का दुश्मन और सुशासन का झंडाबरदार कहने वाले नीतीश और केजरीवाल ने एक-दूसरे से राजनीतिक गठजोड़ कर लिया है। जबकि केजरीवाल और नीतीश, लालू शासनकाल के जंगलराज पर सोची-समझी चुप्पी साधे हुए हैं। अर्थात नीतीश-लालू के गठजोड़ पर केजरीवाल की सैद्धांतिक सहमति मिल गई है! पर एक कहावत है जिससे केजरीवाल और नीतीश बच नहीं पाएंगे, कि काजल की कोठरी में चाहे लाख जतन करो, काजल का दाग भाई लागे ही लागे।
केजरीवाल के प्रमाणपत्र देने से नीतीश कुमार बच नहीं सकते। मौजूं सवाल तो उनसे पूछे ही जाने चाहिए कि आखिर क्यों ऐसे व्यक्ति से हाथ मिलाया जिसने बिहार को पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा और जंगलराज के गर्त में धकेल दिया था? ऐसी क्या जरूरत और मजबूरी आन पड़ी कि बिहार को शर्मसार कर देने वाले चारा घोटाले के सूत्रधार से उन्होंने हाथ मिला लिया? बिहारियों को पलायन और जलालत झेलने पर मजबूर कर देने वाले व्यक्ति और दल से हाथ मिलाना क्या बिहार की जनता का अपमान नहीं है?
ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब नीतीश को आने वाले चुनाव में देने पड़ेंगे। उन्होंने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के कारण बिहार की जनता के हितों और जनादेश की बलि चढ़ा दी। केजरीवाल भी महज व्यक्तिगत स्वार्थ को सिद्ध करने के कारण नीतीश से हाथ मिला रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दिल्ली में खासा प्रभाव रखने वाले पूर्वांचल के मतदाता उनके पाले में आ सकते हैं। केजरीवाल ने हाल में ही मैथिली-भोजपुरी अकादमी सम्मान समारोह आयोजित कर बिहारियों को सम्मानित किया था और नीतीश कुमार को बुला कर इस अकादमी को राजनीति का अखाड़ा बना डाला। पर केजरीवाल लालू से पल्ला झाड़ रहे हैं। आखिर वे ऐसा कैसे कर सकते हैं जब नीतीश कुमार ने ही लालू को गले लगा लिया है?
दिलचस्प है राजनीति की बाजीगरी। कैसे एक दल, विपक्षी दल को कोस-कोस कर सत्ता हथिया लेता है और फिर कुछ समय बाद उसी के साथ गलबहियां करने लगता है! जो नेता दूसरे को पानी पी-पी कर कोसता है वही बाद में उसी के तारीफों के पुल बांधने लगता है। जनता है कि कुछ बेहतर की उम्मीद में खुद को बार-बार ठगा हुआ महसूस करती है। बिहार में इस बार नेताओं के चाल-चरित्र को भी मुद्दा बनाया जाना चाहिए। वोट बटोरने और सत्ता पाने के अनैतिक तरीकों पर सभी दलों की सैद्धांतिक सहमति होती है। सिद्धांत और मूल्य जाएं भाड़ में! यह जनता ही है जिसे भूलने की आदत होती है। हमें समझना चाहिए, गलती उनकी नहीं हमारी है।
केशव झा, दरभंगा
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