आरक्षण के चक्कर में योग्य और सक्षम होते हुए भी एक के बाद एक समुदाय इसकी मांग किए जा रहा है। न कोई इस औचित्यहीन आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने के लिए आवाज उठा रहा है और न कोई इस योग्य बनने का प्रयास कर रहा है कि आरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े। ऐसा इसलिए कि लोगों को यह व्यवस्था समाप्त करने के बजाय इसकी मांग करना ज्यादा आसान लगता है।

आरक्षण का प्रावधान लोगों को अक्षम और आलसी नहीं बल्कि हाशिये पर खड़े समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए किया गया था। पर अब इसका उद्देश्य बदल गया है। हम सबका प्रयास लोगों को योग्य बनाने का होना चाहिए न कि बिना आधार आरक्षण की मांग करने का। यह हमें तय करना है कि चलने के योग्य बनना है या बैसाखी थामनी है।
प्रशांत तिवारी, जौनपुर

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta