वामपंथी चिंतक तो पूरे विश्व को एक ही मानते हैं, जिसमें किसी सीमा, सेना और पुलिस आदि की कभी कोई जरूरत ही नहीं समझते, क्योंकि उनकी नजर में सब समान हैं। अगर माओवादी व्यवस्था पूरी दुनिया में लागू हो भी जाए तो यह शायद कोई बुरी बात नहीं है।
मगर आज बड़ा दुख तो इस बात का है कि माओवादी और नक्सलवादी सभी अपने सही उद्देश्य से भटक कर अमानवीय हिंसक हरकतों में लिप्त हैं, जिससे वे खुद बदनाम होकर दुनिया के पास होने के बजाय दूर और अलग होकर अपने खात्मे की ओर बढ़ते-से लग रहे हैं।
वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली</strong>
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