के. विक्रम राव के लेख ‘गांधी की फिक्र किसे है!’ (14 जुलाई) में शोध की महक कम और क्रोध की गंध अधिक है। विचार चाहे गांधीजी के क्यों न हों, वे सर्वमान्य होने ही चाहिए, ऐसा सोच बौद्धिक विकास को कुंठित ही करेगा। गांधीजी की मंशा, एक विचार और आदर्श जीवनयापक के प्रतीक रूप में, यादों में बने रहने की ही थी। सत्यत: गांधी विचारधारा और उनके सत्यशोधन के तरीकों को जहां व्यापक जनाधार मिला, वहीं इसके आलोचक भी सदैव रहे। पर न तो दिनकर जोशी को ‘उजाले की परछार्इं’ के लिए जेल हुई और न ही जेड एडम्स के पुतले जले ‘गांधी-नेकेड एम्बिशन’ लिखने के लिए।

मतभेद विचारों को पुख्ता करता है, उन्हें बहुआयामी बनाता है, ‘सामूहिक मतैक्य’ तो अस्वस्थ्य प्रजातंत्र का द्योतक है। यह चिंता का विषय है कि नामचीन विचारक भी, मत-भिन्नता रखने वालों के पुतले जलाने को कह रहे हैं। इस देश के नब्बे प्रतिशत लोगों को काटजूजी ने मूर्ख कहा तो बुरा लगा लेकिन के. विक्रम राव ने तो भारतवासियों को ‘बिना मगज का कंकाल’ घोषित किया है तो क्या उनके घर के बाहर जाकर नारेबाजी की जाए?

नहीं, क्योंकि सत्यत: भारतवासी न तो मूढ़ हैं और न ही खोखली खोपड़ी वाले। वे सहनशील हैं, वे कबीर और तुलसी को एक साथ स्वीकार करते हैं। वे कृष्ण को पूजते तो हैं पर ‘उपसंहार’ लिखने पर काशीनाथ सिंह को भी सराहते हैं।
उपर्युक्त लेख इन दिनों तेजी से पनपते ‘बौद्धिक उग्रवाद’ का एक नमूना है जिसके तहत पाठक को विचारों के बजाय ओछे तंजों और अनावश्यक जुमलों से उद्वेलित किया जाता है। गांधी एक महान आत्मा थे या नहीं, वे ब्रिटिश एजेंट थे या नहीं, इसकी पड़ताल करते वक्त लेखक ‘प्लांशेट’ (एक ऐसा खेल जिसमें मृतात्मा से साक्षात्कार करने का दावा किया जाता है) के बजाय वस्तुपरक तथ्य रखता तो यह लेख संग्रहणीय बन सकता था।
अजय सोडानी, कालिंदी कुंज, इंदौर</strong>

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