भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां अभिव्यक्ति की आजादी मौलिक अधिकार के रूप में दी गई है वहीं कुछ लोगों के लिए यही अभिव्यक्ति मौत का कारण भी बन जाती है। खासतौर पर उस समय जब उनकी अभिव्यक्ति कुरीतियों, धार्मिक कर्मकांडों के खिलाफ हो। कन्नड़ साहित्य के विद्वान और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित एमएम कुलबर्गी की तीस अगस्त को इसलिए हत्या कर दी गई कि उनका बोलना-लिखना कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता था।
समाज में तर्कशीलता, वैज्ञानिकता का संचार करने वाले कुलबर्गी कन्नड़ विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे। अपनी सतहत्तर साल की उम्र में 103 पुस्तकें और 400 लेख लिखने वाले कुलबर्गी सामाजिक अराजकतावादियों का शिकार होने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं। इससे पहले भी गोविन्द पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर की हत्या भी धार्मिक कर्मकांडों, अंधविश्वासों के खिलाफ बोलने के कारण हुई। इन नवजागरणवादियों की हत्या साबित करती है कि हमारे समाज में अब भी अंधविश्वास, आडंबर जैसी कुरीतियां व्याप्त हैं।
आखिर ऐसी कौन-सी शक्ति हमारे समाज में पैदा हो गई है जो अपने ही लोगों के लिए भय और खतरा बनती जा रही है। इस प्रकार की अतिवादी शक्तियां अगर समाज में बढ़ती रहीं और बोलने के बदले लोगों का मौत से सामना कराती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब कुलबर्गी की जगह हम और आप जैसे लोग होंगे।
जैनबहादुर, जौनपुर
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