उत्तर प्रदेश में माननीय उच्च न्यायालय का आदेश आते ही समाज में हलचल-सी देखी जा सकती है। बहुत दिनों बाद इस तरह की खबर आई कि सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और माननीयों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे। हमारे विद्यालयों के शिक्षक चाहे वे किसी स्तर पर, मतलब प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के मामलों में दूसरे देशों की ही नकल करना सीख रहे हैं।
हमारे यहां विद्यादान महादान कहा जाता है। लेकिन आज कोचिंग कक्षाओं का बढ़ता चलन समाज को कहां ले जाएगा, यह कहा नहीं जा सकता! हमारे शिक्षक कक्षाओं में दूसरे देशों के विद्वानों के उद्धरण ज्यादा कोट करना सीख रहे हैं और इसी में अपनी विद्वत्ता समझ रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर मिड-डे मील की हालत जगजाहिर है? विद्यालयों में खाना बनाने का काम नहीं होना चाहिए, इससे पठन-पाठन का काम बाधित हो रहा है। पढ़ाने वाले शिक्षक का नाम शिक्षा-मित्र होता है उसका वेतन कितना होता है? यह विचारणीय प्रश्न है? किस कक्षा तक के छात्रों को फेल या पास करना है इसका फैसला विधान सभाएं या संसद करेंगी या शिक्षा जगत के विद्वानों द्वारा होगा? पाठ्यक्रम का निर्धारण कौन करेगा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम पास हो चुका है।
बच्चों का प्रवेश किस उम्र से प्राथमिक स्तर पर होगा, यह आए दिन अखबार की खबर होती है। इतना सब कुछ होने के बावजूद आज भी कम से कम अस्सी प्रतिशत पढ़े-लिखे लोग, जो कि उच्च शिक्षा में हैं गांव के प्राइमरी विद्यालयों में शिक्षा पाए होंगे। सारांश यह है कि हम अपने विचार, आदर्श भूलते जा रहे हैं और दूसरे देशों का अनुकरण करते जा रहे हैं, यह ठीक नहीं है। अब जो शुरुआत माननीय न्यायालय द्वारा हुई है उससे एक उम्मीद जगी है कि शायद शिक्षा की हालत में सुधार हो!
राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ</strong>
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