संपादकीय ‘दिल्ली की जंग’ (23 जुलाई) में आपकी राय के विपरीत तथ्य यह है कि दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के लिए उपराज्यपाल (एलजी) की मंजूरी लिया जाना जरूरी है, जो नहीं ली गई। बात बस इतनी है। पर आपने तिल का ताड़ बना दिया और यह तक लिख दिया कि ‘उपराज्यपाल निर्वाचित सरकार के संवैधानिक अधिकारों को ध्वस्त करने पर तुले हैं’।
आप इतने पर ही नहीं रुके। आगे लिखा कि ‘दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद महिलाओं के खिलाफ हुए आपराधिक मामलों को लेकर बैठक होनी थी। जाहिर है, इसमें दिल्ली पुलिस से जवाब तलब किया जाता। इससे केंद्र सरकार की संजीदगी पर भी अंगुली उठती।’
देर-सबेर महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति होनी ही थी, तो जाहिर है कि महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के मामलों को लेकर बैठक भी होती। इस तरह हवा में तीर मारना उचित नहीं है।
शमीम उद्दीन, वसुंधरा, गाजियाबाद
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