इसी साल अगस्त महीने में भारत सरकार ने रिजर्व बैंक की आपातकालीन संचित राशि में से 24.8 अरब डॉलर, मतलब 17 खरब 60 अरब रुपए यह कर ले लिया कि ‘सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों की नाजुक हालात को ठीक करने के लिए उसे पैसों की सख्त जरूरत है।’ उस समय सरकार के इस कदम की पूरे देश भर में आलोचना हुई थी। इसके अतिरिक्त सरकार के इसी पैसे लेने के दबाव की वजह से कई विवाद उभरने की खबरें आ रही थीं।

इसके बावजूद भी आज भी सरकार के अनुसार बैंकों, रेलवे, भेल, इंडियन आॅयल, एयर इंडिया और केंद्रीय विश्वविद्यालयों आदि की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह उनका निजीकरण करने और बेचने तक की बात चल रही है। कई प्रतिष्ठित पुरानी और स्थापित कंपनियों की हालत ज्यादा खराब होने की वजह से लाखों लोगों की नौकरियां चली गई हैं। देश की वित्तमंत्री के अनुसार अगले साल मार्च तक इनमें से कई संस्थानों को बेच दिया जाएगा।

सवाल है और यह देश की जनता को जानने का हक भी है कि सरकार रिजर्व बैंक से बड़ी मात्रा में देश की आपातकालीन संचित राशि निकालने के बाद उन पैसों को अपने कथनानुसार कितने सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों की नाजुक हालात को सुधार चुकी है। यह देश की आम जनता का मूल अधिकार है कि वह सरकार से अपनी मेहनत और खून-पसीने की कमाई में से टैक्स के रूप में जमा किए हुए पैसों का हिसाब मांगे, क्योंकि वे पैसे देश की जनता के ही हैं।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

लोकतंत्र के सवाल

एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी होता है कि उसमें सवालों का स्थान हो। सवाल, जो लोकतंत्र को जिंदा रखते हैं। सवाल, जो आपको कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते हैं। सवाल, जो आपको आत्मचिंतन करने के लिए मजबूर करते हैं। सवाल, जिनमें बदलाव की चिंगारी छिपी होती है, पर जब सवाल करना गुनाह साबित किया जाने लगे, तब फिर से एक सवाल करना चाहिए कि आखिर क्यों सत्ता सवालों से डर रही है! आखिर क्यों सवाल करने वालों को देशद्रोही कह दिया जा रहा है?

जब देश का विपक्ष बदलाव के केंद्र से कोसों दूर भी नजर नहीं आ रहा है, ऐसे में जनता को ही विपक्ष का काम करना पड़ेगा। जिन लोगों पर विश्वास करके जनता ने अपने देश की सत्ता उनके हाथों में सौंपी, उनसे सवाल जनता नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा? किसान, जवान, दिहाड़ी मजदूर, दलित, स्त्री, बुजुर्ग, युवा, अल्पसंख्यक- हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा है।

आज कानून को हाथ में लेकर भीड़तंत्र न्याय करने लगी है। आसपास घटित हर घटना को हिंदू-मुसलिम कि चश्मे से देखा जाने लगा है। नेता अर्थव्यवस्था की बुरी हालत पर नहीं, मंदिर-मस्जिद पर बहस करना चाहते हैं और इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि हम जनता के तौर पर मंदिर-मस्जिद की ही बहस सुनना चाहते हैं शायद। इसीलिए टीवी बहसों से लेकर नेताओं की रैली में भी इन्हीं मुद्दों को लेकर नेता जनता के बीच जाते हैं और लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी नैतिक बातें धरी की धरी रह जाती हैं। सवाल करते रहना एक नागरिक की जिम्मेदारी है और किए गए सवालों का जवाब देना सत्ताधीशों का कर्तव्य। इसलिए सवाल करते रहना चाहिए, क्योंकि यह हमारा अधिकार है।
’मुकुल सिंह, जामिया मिल्लिया, नई दिल्ली</p>

गांधी का अपमान

सांसद प्रज्ञा ठाकुर अपने बोल पर अंकुश नहीं लगा पा रही हैं। सड़क से लेकर संसद तक वही बेढंगे बोल बोले जा रही हैं, जो खुद उनकी पार्टी के हित में भी ठीक नहीं है। समझ में नहीं आता कि आखिरकार उन्हें किन वजहों से यह सब बोलने की छूट मिल रही है। एक तरफ खुद प्रधानमंत्री गांधीजी की महिमा का बखान करते हैं, दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी के लोग गांधीजी को अपमानित करने से बाज नहीं आते हैं।
’हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, मध्यप्रदेश