कद साढ़े तीन फुट, दुबला, पतला, रंग सांवला, उम्र करीब आठ साल। आंखें उदासी लिए और अपने काम में खूब माहिर, कुछ कहने को उत्सुक होंठ मानो सभी से कह रहा है कि यह काम मैं अपनी मर्जी से नहीं बल्कि मजबूरन करने पर विवश हूं।

मैं बात कर रहा हूं उस बच्चे की जो रोज शाम को अखबार बेच कर अपना पेट पालता है। जहां एक ओर हम चांद पर घर बसाने की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर धरती के नन्हे-मुन्ने चांद बेघर हैं।

जिस उम्र में बाकी बच्चे अपने सुनहरे भविष्य की नींव डालते हैं, उस उम्र में यह मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट भरने में लगा हुआ है। देश में न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं जो मजबूरी के कारण पढ़ाई-लिखाई से वंचित हैं और बाल मजदूरी करने को विवश हैं।

सरकार को इनके बारे में अवश्य सोचना चाहिए। बाल मजदूरी को कानूनन जुर्म करार देने भर से इन बच्चों का कल्याण नहीं हो पाएगा बल्कि इन्हें जीवन यापन करने के लिए मदद करनी चाहिए।
’गौरव मिश्र, मधुबनी, बिहार</p>

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