कृषि बनाम उद्योग की बहस भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से शुरू हो चुकी थी। एक तरफ गांधी समर्थक थे जो कृषि एवं ग्रामीण विकास को अर्थव्यवस्था की धुरी बनाना चाहते थे। दूसरी तरफ नेहरू समर्थक थे जो औद्योगिक प्रगति और शहरीकरण को ही देश की प्रगति का आधार मान रहे थे। देश स्वतंत्र हुआ और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही भारत औद्योगिक विकास के सहारे विकसित, संपन्न और खुशहाल बनने की लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ चला।
पंचवर्षीय योजनाएं लागू की गर्इं और उनके केंद्र में औद्योगिक विकास को रखा गया। उद्योगों को फलने-फूलने के लिए सारे साधन उपलब्ध कराए गए। लेकिन ये सारे प्रयत्न भारत को उस मुकाम पर लाने में नाकाम रहे जहां पहुंचने का सपना 15 अगस्त 1947 को प्रत्येक भारतवासी ने अपनी आंखों में संजोया था। तब हम नींद से जागे। हमें समझ आया कि कृषि के साथ यह सौतेला व्यवहार हमें किसी भी अपेक्षित सफलता तक नहीं पहुंचा सकता।
जिस देश की दो तिहाई जनता कृषि पर आश्रित हो और गांवों में रहती हो, वहां कृषि की उपेक्षा का परिणाम वही होता है जो आज हम भुगत रहे हैं। गांवों की बदहाल हालत, शहरों की तरफ अंधी दौड़, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएं, ये सभी हमें आईना दिखाती हैं। हमारी सरकार भी चेती और 2002 से पंचवर्षीय योजनाओं की धुरी कृषि को बनाया गया। लेकिन इस सबमें काफी देर हो चुकी है और इसलिए अब दोगुने साधन और उद्यम की आवश्यकता है।
गांधी, नेहरू और इस देश के प्रत्येक नागरिक का सपना अंतत: एक ही था संपन्न खुशहाल, आत्मनिर्भर राष्ट्र का सपना। इस सपने को पूरा करने के लिए कृषि और उद्योग दोनों के विकास की आवश्यकता होगी। मगर भारत की आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक संरचना को देखते हुए निस्संदेह कृषि ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। यह बात जितनी जल्द सरकार और विदेशी चकाचौंध के पीछे अंधाधुंध भागती भारत की जनता समझेगी और अमल में लाएगी उतना ही उज्ज्वल भारत हम अपने भविष्य में पाएंगे।
’श्वेता शर्मा, कोलकात
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