आज देश ने अपना कदम ‘डिजिटल इंडिया’ की ओर बढ़ाया तो है, लेकिन इसकी नींव बहुत ही कमजोर है। इस कार्यक्रम की पहुंच की कल्पना हर युवा से लेकर किसान तक की जा रही है, पर क्या सरकार किसानों की वास्तविक हालात से वाकिफ है? शायद ऐसा नहीं है। सरकार तो किसान सिर्फ उसे मान कर मुआवजे और सेवाएं देती है, जिनके पास जमीन है या वे जमींदार हैं।
जो भूमिहीन किसान एक साल के लिए रुपए देकर खेती करते हैं, क्या उनकी फसलों का नुकसान नहीं होता? क्या उन्हें राहत पाने का अधिकार नहीं है? खेत मालिक तो ऐसी स्थितियों में दोहरा लाभ लेते हैं। वे किसान से एक साल की कीमत तो लेते ही हैं, साथ ही आपदाओं के आने पर राहत कोष से भी उन्हें मदद मिल जाती है।
दूसरी ओर, जब हम युवा शक्ति की बात करते हैं तो उसमें भी शक होने लगता है, क्योंकि इसके कर्णधारों को आज भी बालश्रम की चक्की में पिसते कहीं भी आसानी से देख सकता है। जहां गरीब ज्यादा गरीब और अमीर ज्यादा अमीर होता जा रहा हो, ऐसी विभिन्न परिस्थितियों में देश को डिजिटल इंडिया का मुखौटा कुछ रास नहीं आता है। यह चुनावी जुमले से ज्यादा कुछ नहीं लगता। आज तक कितनी योजनाएं प्रभावी ढंग से किसानों और बालश्रमिकों के हित में सफल हुई हैं, यह तय कर पाना बहुत ही कठिन है।
’प्रेम कुमार, कानपुर नगर
