महेंद्र अवधेश का लेख ‘आचरण की कसौटी पर शिक्षक’ (23 नवंबर) पढ़ कर शिक्षक बनने का अभिलाषी मन कराह उठा। कई प्रश्न कौंधने लगे। एक वाकये का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। एम फिल में दाखिला ले रही एक छात्रा ने एमए, हिंदी के दौरान अपने शैक्षणिक अनुभव जब हमसे बांटे तो धरणा पुष्ट हो गई कि आधुनिक शिक्षक भी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। वे सजातीय छात्रा-छात्राओं को तरजीह देते हैं।

उस छात्रा का कहना था कि अगर हम अमुक शिक्षक की जाति के होते या उनका कहना मान लेते तो मेरा ‘परसेंटेज’ कुछ और होता। जब हमने अन्य शिक्षकों की तुलना में उन्हें बेहतर बताते हुए दलील दी कि वे तो जेपी आंदोलन में जेल जा चुके हैं, जनेऊ तोड़ चुके हैं, आदिवासियों के बीच निर्विकार भाव से सेवा दे चुके हैं तो वह छात्रा आगे और न मुंह खुलवाने की बात कह कर चली गई।

‘और न मुंह खुलवाने’ वाली बात आज भी कचोटती है। जब मैं अपने अनुभव को महेंद्र अवधेश के लेख से जोड़ कर देखता हूं तो उस छात्रा की विवशता और पीड़ा समझने में मदद मिलती है। गुरु की कथनी और करनी में वह भाव क्यों नहीं है? ‘प्रियजन हिताय’ से आगे बढ़कर ‘सर्वजन हिताय’ वाली बात क्यों नहीं सोच पाते? यह प्रश्न आज भी विचारणीय है।

महेंद्र अवधेश के लेख में कलंकित गुरुओं की फेहरिस्त काफी लंबी है। युगद्रष्टा कबीर ने ऐसे गुरुओं से सावधान किया है- जो सही मायने में गुरु के गुणों से युक्त तो नहीं हैं पर वे गुरु बने हुए हैं। समाज में घूम-घूम कर लोगों को घपले में डालते हैं। उन्हें ठगते हैं और अंधकूप में ला पहुंचाते हैं। कारण, वे स्वयं अंधे हैं और शिष्य तो अज्ञान के कारण अंधा रहता ही है। फिर दो अंधे मिलकर अपना नाश करते हैं।

अवधेशजी ने सही सवाल उठाया है कि ‘बच्चों के मन में स्कूल और शिक्षकों के प्रति जो भय घर करता जा रहा है, वह बहुत चिंतनीय है। आज शिक्षकों और शिक्षा के मंदिरों की गरिमा तथा अभिभावकों का विश्वास तार-तार होने से बचाने की सख्त जरूरत है।’

ध्यान देने की बात है कि कक्षा में पढ़ाते हुए हमें न जाने कितनी जोड़ी आंखें केवल देख नहीं रही होतीं, बल्कि सपनों में तैर रही होती हैं। हमें निहारती ये सभी आंखें समान भाव से मुक्त नहीं हैं। कुछ समर्थन में झुकी हैं, तो कुछ जिज्ञासा में खुली हैं, कुछ खामोश हैं तो कुछ विरोध में फैली हैं। हमें इन सबको स्वीकार करना होगा। हो सकता है, वे हमसे न जुड़ सकें, हमें ही मार्ग खोजना होगा। उनके न जुड़ने का कारण ढूंढ़ना होगा।

कुंजीनुमा पुस्तकों की बढ़ती मांग अध्यापकीय सत्ता के सामने एक गंभीर चुनौती है- इसका भी कोई हल ढूंढ़ना होगा। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में एक निर्भीकता का भी मूलमंत्र समाया हुआ है कि ‘किसी से भी मत डरो, शास्त्र से भी नहीं, गुरु से नहीं’। इस मंत्र को छात्रों के दिमाग में बीज के रूप में डालना होगा।
’बालेंद्र कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय