आजादी के बाद भारतीय समाज में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से कई महत्त्वपूर्ण बदलावों का दौर चला जो लगातर जारी है। पर ये बदलाव किन मूल्यों पर आधारित हैं? आजादी के पहले समाज ने दूसरों की गुलामी को नकारते हुए समाज की स्वतंत्रता के लिए एक साथ एक मंच पर अपनी जिंदगी की कुर्बानी देकर हमें सिखाया कि जब तक समाज का हर वर्ग संतुष्ट नहीं होगा, परिवर्तन का दौर चलता रहेगा।
पर क्या आज यह कल्पना की जा सकती है कि होने वाला परिवर्तन समाज के हर वर्ग या व्यक्ति के लिए हितकर है? भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और महात्मा गांधी जैसे देशभक्तों ने क्या ऐसे ही भारत का सपना देखा था जहां देश की आधी आबादी को दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होगी?
कर्ज के तले दबे किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना होगा और हमारे हुक्मरान उनकी जमीन छीनकर उन्हें विकास की परिभाषा बताएंगे। सांप्रदायिकता की बढ़ती आग, भ्रष्टाचार की बढ़ती लौ और शहीदों की चिताओं से उठता धुआं आखिरकार क्या इसी उन्नत समाज की कल्पना की थी? पृथ्वी से चांद और मंगल की दूरी तो हमने नाप ली पर गरीब की थाली तक हम नहीं पहुंच पाए।
आखिर क्या कारण है इस सबका जो हमें पूछने को मजबूर करता है कि कैसा विकास, किसकी तरक्की? देश की कुल संपति का 90 प्रतिशत हिस्सा, 10 प्रतिशत आबादी के हाथों में है।
एक तरफ वह आबादी है जो जीवन की मूलभूत सुविधाओं- घर, भूख, बीमारी और अज्ञान स

