समाज में शांति, सद्भाव और भाईचारे की स्थापना से ही विकास की इबारत लिखी जा सकती है। समता और न्यायपूर्ण व्यवस्था ही शांति और सद्भाव को संबल देने के आधारभूत तत्त्व हैं। चूंकि आज की राजनीति में समता, न्यायपूर्ण विकास और लाभ के वितरण का मुद्दा गौण होता जा रहा है, लोगों को बांटने में ही उसे अपना हित दिखाई दे रहा है, इसलिए धर्म, जाति, संप्रदाय आदि के नाम पर वैमनस्य की खाई को बढ़ावा दे रही है।
इन मुद्दों पर राजनीतिक इच्छा शक्तिजब कमजोर दिखाई दी या उसकी निष्क्रिय चुप्पी ने उकसाने वाले तत्त्वों और बयानवीरों के हौंसले बुलंद किए तो स्वाभाविक आशंकाएं पैदा हुर्इं और विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के साहित्यकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, कलाकारों ने अपने-अपने तरीके से असहिष्णुता के मुद्दे पर आवाजें उठार्इं और प्रतिरोध की कार्रवाई भी की। इन आवाजों को सुनने, समझने और समस्या के निदान के प्रयास के बजाए इन कदमों को राजनीति से प्रेरित, दुर्भावनापूर्ण और राष्ट्रद्रोही तक कहा गया। राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर सचेत करने के बावजूद बात-बात पर लोगों को पाकिस्तान भेजने और राष्ट्रद्रोही घोषित करने वाले बयानवीरों को संयमित करने के लिए कोई ठोस और प्रभावी संकेत नहीं दिए गए।
इस बीच गृहमंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से एक सकारात्मक पहल ‘साहित्यकारों से संवाद’ के संकेत आए थे लेकिन उन पर कोई पहल नहीं हुई। प्रतिरोध करने वालों को पुरस्कार कब मिले और पूर्व में हुई घटनाओं पर उनके साहित्यिक अवदान को जाने बगैर ‘पहले क्यों नहीं लौटाए’ जैसे अनेक कुतर्क गढ़े गए, उन्हें अपमानित-लांछित करने के लिए अनेक तरह के प्रयास किए गए। साहित्यकार, इतिहासकार, वैज्ञानिक, कलाकार, विचारक देश के गौरव हैं, संवैधानिक, मानवीय और जीवनमूल्यों के प्रति उनकी चिंताएं उनके सामाजिक सरोकारों की प्रतीक हैं।
जब असहिष्णुता के मुद्दे को सिरे से नकारा जा रहा था, इस विषय पर ध्यानाकर्षित करने वालों को देशद्रोही माना जा रहा था उसी बीच फिल्म अभिनेता आमिर खान ने अपनी पत्नी की आशंकाओं और देश छोड़ने के विचार को रखा। आमिर के बयान पर इस तरह हमलावर होने का क्या औचित्य है? क्या, इसके पूर्व एमएफ हुसेन देश छोड़ने पर मजबूर नहीं हुए थे? क्या हुसेन के निर्वासन से देश की प्रतिष्ठा दुनिया में बढ़ी थी? आमिर खान तो संपन्न हैं। वे सार्वजनिक घोषणा किए बगैर भी अन्यत्र बस सकते हैं पर करोड़ों निर्धनों-मजदूरों को रोज जीवनयापन के लिए अपना खून-पसीना इसी देश में एक करना है। क्या असहिष्णुता के भय के बरक्स विश्वास का माहौल पैदा करने की कोई ठोस पहल नहीं की जा सकती है? या भूख, गरीबी, कुपोषण, बेकारी, किसानों की आत्महत्या, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण के बुनियादी सवालों से बचने में ये विवाद या बहस मददगार सिद्ध होते हैं?
’सुरेश उपाध्याय, गीता

