सोना-चांदी का नाम हमेशा साथ-साथ लिया जाता है। लेकिन सोने को जहां महंगी धातु मानकर संपत्ति के तौर पर अर्जित किया जाता रहा है वहीं चांदी को हमेशा एक ज्यादा किफायती धातु के तौर पर खरीदा-बेचा जाता रहा है। भारत में सोने को हमेशा से सुरक्षित संपत्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। चांदी भी हमेशा सोने के साथ-साथ चली है लेकिन किफायती होने के चलते यह सिर्फ रईसों की नहीं बल्कि गरीबों के गहनों के तौर पर भी अपनी जगह बना सकी। लेकिन पिछले 6 महीने में खेल बदल गया है। अब चांदी सिर्फ एक किफायती व कीमती धातु नहीं रही बल्कि यह वैश्विक कारोबार और ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बनकर उभर रही है। सिल्वर ने इस साल कमोडिटी बाज़ार में सबसे तेज उछाल दर्ज किया।

वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच निवेशकों के सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करने से चांदी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई। साल 2025 में भारत ने लगभग 9.2 अरब डॉलर की चांदी का आयात किया जिससे देश दुनिया का सबसे बड़ा चांदी उपभोक्ता बन गया। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि भारत अभी तक चांदी की प्रोसेसिंग में आत्मनिर्भर नहीं है। यही वजह है कि वैश्विक आपूर्ति और भू-राजनीतिक दबाव के बीच भारत की चांदी सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत ने अब कदम नहीं उठाए तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि औद्योगिक और ऊर्जा महत्व में भी पीछे रह सकता है।

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GLOBAL TRADE RESEARCH INITIATIVE (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में MCX पर चांदी की कीमत जनवरी 2026 की शुरुआत में 2.4-2.6 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई जबकि मौजूदा भाव 2.70 लाख रुपये प्रति किलो से ऊपर बनी हुई हैं। जनवरी 2025 की शुरुआत में चांदी का भाव 80000-85000 रुपये प्रति किलो पर था और इस हिसाब से देखें तो सिल्वर की कीमतों में आया यह उछाल असाधारण है। यानी एक साल के भीतर रुपये के हिसाब से चांदी की कीमत लगभग तीन गुना हो गई जो कि लंबे समय तक चलने वाली वाली इस धातु के लिए असामान्य है।

मांग में आई इस तेज बढ़ोतरी के साथ आयात भी उछला। साल 2025 में भारत का चांदी आयात अनुमानित रूप से 9.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

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वैश्विक परिष्कृत चांदी व्यापार (Global Refined Silver Trade) में लगभग 21.4% हिस्सेदारी के साथ भारत अब एक उभरते वैश्विक “सिल्वर वॉर” का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह प्रतिस्पर्धा औद्योगिक मांग, हरित ऊर्जा लक्ष्यों और सप्लाई चेन्स पर भू-राजनीतिक होड़ से प्रेरित है। यह तेजी केवल निवेशकों की भावना नहीं बल्कि चांदी के उत्पादन, व्यापार और इस्तेमाल के ढांचे में हो रहे गहरे संरचनात्मक बदलाव को दिखाती है। जीटीआरआई ने हाल ही में आई अपनी एक रिपोर्ट में चांदी को लेकर कुछ बड़े फैक्ट्स का खुलासा किया है।

ग्लोबल ट्रेड में आई तेजी

चांदी के ग्लोबल ट्रेड आंकड़े इस बदलाव को स्पष्ट करते हैं। पिछले दो दशकों में चांदी अयस्क और संकेंद्रण (ores and concentrates) का व्यापार साल 2000 में मात्र 0.1 अरब डॉलर था जो 2024 में बढ़कर 6.27 अरब डॉलर हो गया। रिफाइंड सिल्वर का ट्रेड इससे भी तेज़ी से बढ़ा है। चांदी की ईंटों, सिल्लियों, छड़ों, तारों, पाउडर और बुलियन का वैश्विक व्यापार साल 2000 में 4.06 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 31.42 अरब डॉलर तक पहुंच गया। बहुत कम कमोडिटी ऐसी हैं जिनमें कच्चे माल और तैयार उत्पाद- दोनों में इतनी निरंतर और व्यापक बढ़ोत्तरी दिखी हो।

हर जगह चांदी का इस्तेमाल

चांदी की मांग में आई इस बढ़ोत्तरी का कारण चांदी का अलग-अलग सेक्टरों में इस्तेमाल है। यह अब भी आभूषण, चांदी के बर्तन और सिक्कों में महत्वपूर्ण है- खासतौर पर भारत जैसे देशों में जहां सांस्कृतिक तौर पर इसकी मांग ज्यादा है। लेकिन अब इसकी रणनीतिक अहमियत मुख्य रूप से उद्योग से आती है। चांदी में सभी धातुओं में सबसे ज्यादा विद्युत और तापीय चालकता (Electrical and thermal conductivity) होती है जिससे यह इलेक्ट्रॉनिक्स, सर्किट बोर्ड, कनेक्टर, बैटरी और ऑटोमोटिव सिस्टम के लिए जरूरी बन जाती है।

ग्रीन एनर्जी और मेडिकल में मांग

ग्रीन एनर्जी (हरित ऊर्जा) में चांदी की भूमिका में बड़ा बदलाव हुआ है। सोलर फोटोवोल्टिक सेल्स में चांदी का इस्तेमाल कंडक्टिव पेस्ट के रूप में किया जाता है जिससे एफिशिएंसी यानी दक्षता बढ़ती है। सौर ऊर्जा पहले ही वैश्विक चांदी मांग का लगभग 15% हिस्सा बन चुकी है और नवीकरणीय (Renewable) क्षमता बढ़ने के साथ यह हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र में चांदी के जीवाणुरोधी (antibacterial) क्वॉलिटीज़ का इस्तेमाल घाव की ड्रेसिंग, मेडिकल डिवाइस कोटिंग, कैथेटर, सर्जिकल टूल्स, वाटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम और दवाओं में किया जाता है। चांदी अब सिर्फ कीमती नहीं बल्कि बुनियादी ढांचागत धातु (infrastructural) बन चुकी है।

बाज़ार में क्यों हो रहा बदलाव?

GTRI ने अपनी रिपोर्ट में बताया है, मांग में लगातार इजाफा हो रहा है और कमी आ रही है। कई सालों से वैश्विक खपत, आपूर्ति से ज्यादा बनी हुई है जिससे हर साल 200–250 मिलियन औंस का घाटा हो रहा है। खनन उत्पादन लगभग स्थिर है जबकि औद्योगिक मांग में तेज उछाल आया है। आज वैश्विक चांदी मांग का 55-60% हिस्सा औद्योगिक उपयोग से आता है जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण और चिकित्सा तकनीक आगे बढ़ा रही हैं।

निवेश और भू-राजनीति तनाव ने किया आग में घी का काम

वित्तीय कारक भी चांदी में इस तेजी को हवा दे रहे हैं। सोना 2,000 डॉलर प्रति औंस से ऊपर कारोबार कर रहा है। ऐसे में निवेशक सस्ते हेज ऑप्शन के तौर पर चांदी की ओर रुख कर रहे हैं। इससे खासकर एशिया में ETF, सिल्वर बार और सिक्कों की मांग बढ़ी है। भू-राजनीतिक बिखराव और मुद्राओं के बढ़ते राजनीतिक इस्तेमाल ने कुछ केंद्रीय बैंकों और बड़े निवेशकों को सोने के साथ-साथ चांदी की रणनीतिक भूमिका पर दोबारा विचार करने को मजबूर किया है। सीमित नई खनन क्षमता और तेजी से बढ़ते तकनीकी इस्तेमाल के बीच चांदी को भविष्य की औद्योगिक और ऊर्जा प्रभुत्व से जुड़ी धातु के रूप में देखा जा रहा है।

चीन ने कसा आपूर्ति पर शिकंजा

नीतिगत फैसले इन दबावों को और बढ़ा रहे हैं। चीन ने 1 जनवरी 2026 से चांदी के निर्यात को लाइसेंस-आधारित सिस्टम के तहत कर दिया है। नए नियमों के तहत केवल स्वीकृत कंपनियां ही चांदी का निर्यात कर सकती हैं और हर खेप के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी होगी। यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं है लेकिन चीन की प्रोसेसिंग में बड़ी भूमिका को देखते हुए इससे वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं और कीमतों में अस्थिरता आई है।

‘गायब’ चांदी का रहस्य

सबसे चिंताजनक संकेत वैश्विक व्यापार आंकड़ों से मिलते है। 2024 में चांदी अयस्क और कॉन्सन्ट्रेट्स (silver ores and concentrates) का दर्ज वैश्विक निर्यात मात्र 2.7 अरब डॉलर था जबकि आयात 6.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इनमें से लगभग 90% आयात चीन ने किए। निर्यात और आयात के बीच का यह फर्क बहुत बड़ा है।

यह असंतुलन कम रिपोर्ट किए गए या अपारदर्शी लेनदेन की ओर इशारा करता है जिसमें कुछ सप्लायर्स देश प्रतिबंधों या निगरानी से बचने के लिए वैकल्पिक रास्तों से चांदी की बिक्री कर रहे हों। सोने के उलट, चांदी की सप्लाई चेन्स अब भी काफी अपारदर्शी हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ यह एक रणनीतिक कमजोरी बनती जा रही है।

भारत के आयात में उछाल

चांदी को लेकर, भारत इस बदलते परिदृश्य के केंद्र में है और रिफाइंड चांदी का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक बन चुका है। भारत चांदी अयस्क का व्यापार नहीं करता, लेकिन चांदी की ईंटों और छड़ों का प्रमुख खरीदार है। लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, FY2025 में भारत ने जहां केवल 478.4 मिलियन डॉलर के चांदी उत्पादों का निर्यात किया। वहीं 4.83 अरब डॉलर का आयात किया जो उसकी बड़ी आयात निर्भरता को दिखाता है।

2025 में यह निर्भरता और बढ़ गई। अक्टूबर में अकेले 2.7 अरब डॉलर का आयात हुआ जो साल-दर-साल 529% की बढ़ोतरी है और नवंबर में 1.1 अरब डॉलर (126% वृद्धि) का आयात दर्ज किया गया। जनवरी-नवंबर 2025 के दौरान कुल आयात 8.5 अरब डॉलर रहा और पूरे साल के लिए इसे 9.2 अरब डॉलर आंका गया जो 2024 से लगभग 44% ज्यादा है। अप्रैल-अक्टूबर 2025 के बीच आयात का बड़ा हिस्सा कुछ ही स्रोतों से आया। इनमें हॉन्ग कॉन्ग (38.4%) और यूके (31.7%) ने मिलकर लगभग 70% आयात किया।

चीन की प्रोसेसिंग, भारत में खपत

चीन चांदी का सबसे बड़ा प्रोसेसर है और 6.3 अरब डॉलर के वैश्विक आयात में से लगभग 5.6 अरब डॉलर का अयस्क और संकेंद्रण (silver ores and concentrates) आयात करता है। इसके अलावा वह उच्च मूल्य वाले चांदी-आधारित उत्पाद- जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइस और सोलर पैनल निर्यात करता है। इसके विपरीत भारत ने 2024 में लगभग 6.4 अरब डॉलर की परिष्कृत चांदी (Refined Silver) आयात की जो वैश्विक व्यापार का 21.4% है। भारत तैयार चांदी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है लेकिन प्रोसेसिंग नहीं करता। भारत को चांदी को अयस्क (ore) के स्तर से ही प्रोसेसिंग करना सीखना चाहिए ताकि देश में उसका अधिक मूल्य (value) बनाया जा सके।

भारत के लिए रणनीतिक धातु

भारत को चांदी को केवल एक कीमती धातु नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और एनर्जी ट्रांजिशन मेटल के रूप में पहचानना चाहिए और इसे अपनी खनिज तथा स्वच्छ ऊर्जा रणनीति (क्लीन एनर्जी स्ट्रेटजी) में शामिल करना चाहिए। इसके लिए विदेशी खनन साझेदारियों के जरिए लॉन्ग-टर्म आपूर्ति सुनिश्चित करना, घरेलू रिफाइनिंग और रीसाइक्लिंग क्षमता को बढ़ावा देना और कुछ चुनिंदा व्यापारिक केंद्रों पर निर्भरता घटाना जरूरी है। बिखरते वैश्विक परिदृश्य में चांदी को सुरक्षित करना अब ऊर्जा सुरक्षा जितना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भारत की नीतियों को भी इस बदलाव को ध्यान में रखना चाहिए।