पिछले कुछ दिनों से भारत-यूरोपीय संघ मु्क्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर हर तरफ चर्चा है। शिखर सम्मेलन में मंगलवार, 27 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-EU फ्री ट्रेड डील का ऐलान किया। पीएम मोदी ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की मेजबानी की। पीएम मोदी ने कहा कि इसमें ग्लोबल जीडीपी का 25 प्रतिशत और ग्लोब ट्रेड का एक तिहाई हिस्सा शामिल है। ‘भारतीय ऊर्जा सप्ताह’ को वर्चुअली संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि लोग, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल द डील्स’ (सबसे अहम समझौता) बता रहे हैं। द्विपक्षीय व्यापार, भारत-यूरोपीय संघ संबंधों का आधार स्तंभ है।
गौर करने वाली बात है कि 2024-25 में कुल व्यापार 190 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया। भारत ने यूरोपीय संघ को 75.9 अरब अमेरिकी डॉलर का सामान और सर्विस सेक्टर में 30 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया। दूसरी ओर यूरोपीय संघ ने भारत को 60.7 अरब अमेरिकी डॉलर का सामान और सर्विस सेक्टर में 23 अरब अमेरिकी डॉलर का एक्सपोर्ट किया।
लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल है कि आखिर भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुए इस फ्री ट्रेड समझौते से क्या होगा? देशभर के एक्सपोर्टर्स के मन में यह सवाल है कि घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचाए बिना India-EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कैसे लागत कम करेगा। आज हम आपको आसान भाषा में समझा रहे हैं कि आखिर भारत-यरोपीय संघ के बीच हुए इस फ्री ट्रेड समझौते से सामान कैसे सस्ता होगा और इसका असर किन-किन सेक्टरों पर पड़ेगा। साथ ही इसके फायदे क्या होंगे…
बता दें कि भारत-यूरोपीय संघ के बीच साल 2007 में सबसे पहले व्यापार वार्ता शुरू हुई थी लेकिन पिछले 6 महीनों में इनमें तेजी आई। GTRI (ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-यूरोपीय संघ (EU) फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से लागत कम होगी और व्यापार बढ़ेगा। जबकि घरेलू उद्योग पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और EU के बीच व्यापार प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि पूरक वैल्यू चेन पर आधारित है।
भारत-EU व्यापार की स्थिति
Global Trade Research Initiative द्वारा जारी लेटेस्ट रिपोर्ट में कुछ आंकड़े बताए गए हैं। FY2025 में भारत और EU के बीच वस्तुओं का व्यापार 136 अरब डॉलर को पार कर गया। यह व्यापार ऐसे सेक्टर्स में है जहां दोनों अर्थव्यवस्थाएं अलग-अलग स्तरों पर काम करती हैं। भारत मुख्य रूप से लेबर-इंटेंसिव और डाउनस्ट्रीम उत्पाद निर्यात करता है जबकि EU कैपिटल गुड्स, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल इनपुट्स की आपूर्ति करता है। इसी वजह से टैरिफ कट दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद माने जा रहे हैं।
इंडस्ट्री को क्यों नहीं है खतरा
GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के EU को होने वाले निर्यात- जैसे स्मार्टफोन, गारमेंट्स, फुटवियर, टायर्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो पार्ट्स, रिफाइंड फ्यूल और कट डायमंड असल में EU की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग से प्रतिस्पर्धा नहीं करते। ये उत्पाद मुख्य रूप से तीसरे देशों से होने वाले EU आयात की जगह लेते हैं क्योंकि इन सेक्टर्स से EU पहले ही बड़े पैमाने पर बाहर निकल चुका है।
वहीं EU से भारत को होने वाला निर्यात जिनमें मशीनरी, एयरक्राफ्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और स्क्रैप शामिल है। ये सीधे भारत की फैक्ट्रियों, MSMEs और रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री में इस्तेमाल होता है।
क्यों टैरिफ कट दोनों के लिए फायदेमंद हैं
मौजूदा वैश्विक माहौल में व्यापार पर टैरिफ और जियोपॉलिटिक्स का असर है। ऐसे में भारत और EU एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि साझेदार हैं। भारत प्रोसेसिंग और लेबर-इंटेंसिव सामान निर्यात करता है जबकि EU एडवांस टेक्नोलॉजी और कैपिटल गुड्स देता है। FY2025 में व्यापार 136 अरब डॉलर से अधिक रहा और टैरिफ कट से लागत घटेगी, वैल्यू चेन इंटीग्रेशन बढ़ेगा और वॉल्यूम बढ़ेगा।
भारत के EU को निर्यात (स्मार्टफोन, गारमेंट्स, फुटवियर, टायर्स, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, रिफाइंड फ्यूल, कट डायमंड) EU की मैन्युफैक्चरिंग को नहीं हटाते क्योंकि ये सेक्टर EU पहले ही ऑफशोर कर चुका है। EU से आने वाले हाई-एंड इनपुट्स भारत की उत्पादकता और एक्सपोर्ट क्षमता बढ़ाते हैं। इसलिए टैरिफ हटने से इनपुट कॉस्ट घटती है, न कि उद्योग प्रभावित होता है।
EU से भारत का आयात (FY2025: 60.7 अरब डॉलर)
हाई-एंड मशीनरी: 13.0 अरब डॉलर
टर्बोजेट: 810 मिलियन डॉलर
इंडस्ट्रियल कंट्रोल वाल्व: 418 मिलियन डॉलर
स्पेशल मशीनरी: 343 मिलियन डॉलर
इलेक्ट्रॉनिक्स: 9.4 अरब डॉलर
मोबाइल पार्ट्स: 3.7 अरब डॉलर
इंटीग्रेटेड सर्किट्स: 890.5 मिलियन डॉलर
एयरक्राफ्ट: 6.3 अरब डॉलर
मेडिकल डिवाइसेज़ और वैज्ञानिक उपकरण: 3.8 अरब डॉलर
स्पेशलाइज्ड दवाएं: 1.4 अरब डॉलर
इंडस्ट्रियल इनपुट्स:
जेम्स एंड ज्वेलरी: 3.0 अरब डॉलर (रफ डायमंड 1.7 अरब)
ऑर्गेनिक केमिकल्स: 2.3 अरब डॉलर
प्लास्टिक: 2.3 अरब डॉलर
आयरन एंड स्टील: 2.4 अरब डॉलर
ऑटोमोटिव: 2.1 अरब डॉलर
वेस्ट और स्क्रैप: 2.1 अरब डॉलर
एल्युमिनियम स्क्रैप: 632 मिलियन डॉलर
ब्रास स्क्रैप: 534 मिलियन डॉलर
ये सभी आयात भारत की मैन्युफैक्चरिंग, MSMEs और रीसाइक्लिंग सेक्टर के लिए जरूरी इनपुट हैं।
EU को भारत का निर्यात (FY2025: 75.9 अरब डॉलर)
रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद: 15.0 अरब डॉलर
डीजल: 9.3 अरब डॉलर
ATF: 5.4 अरब डॉलर
इलेक्ट्रॉनिक्स: 11.3 अरब डॉलर
स्मार्टफोन: 4.3 अरब डॉलर
टेक्सटाइल और अपैरल:
गारमेंट्स: 4.5 अरब डॉलर
टेक्सटाइल्स: 1.6 अरब डॉलर
मेड-अप्स: 1.2 अरब डॉलर
मशीनरी और कंप्यूटर: 5.0 अरब डॉलर
ऑर्गेनिक केमिकल्स: 5.1 अरब डॉलर
आयरन एंड स्टील: 4.9 अरब डॉलर
फार्मास्यूटिकल्स: 3.0 अरब डॉलर
जेम्स एंड ज्वेलरी: 2.5 अरब डॉलर
ऑटोमोटिव एक्सपोर्ट्स: 2.2 अरब डॉलर
अन्य लेबर-इंटेंसिव निर्यात:
टायर्स: 890 मिलियन डॉलर
फुटवियर: 809 मिलियन डॉलर
कॉफी: 775 मिलियन डॉलर
वहीं शराब व्यापार सीमित है।
India-EU FTA की बड़ी बातें
FY2025 में भारत–EU के बीच वस्तुओं का व्यापार 136 अरब डॉलर को पार कर गया। यह व्यापार सीधे प्रतिस्पर्धा पर नहीं बल्कि पूरक वैल्यू चेन पर आधारित है। भारत के EU को होने वाले निर्यात आमतौर पर तीसरे देशों के आयात की जगह लेते हैं ना कि EU के घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से प्रतिस्पर्धा करते हैं।
-EU से आने वाले मशीनरी, एयरक्राफ्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और स्क्रैप सीधे भारत के कारखानों, MSMEs और रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को सपोर्ट करते हैं।
-हाई-एंड मशीनरी भारत का सबसे बड़ा EU आयात रहा (13 अरब डॉलर) जिसमें टर्बोजेट, कंट्रोल वाल्व और स्पेशलाइज्ड इंडस्ट्रियल मशीनें शामिल हैं जिनका बड़े पैमाने पर उत्पादन भारत में नहीं होता।
-इलेक्ट्रॉनिक्स आयात 9.4 अरब डॉलर रहा जो स्मार्टफोन असेंबली और इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट के लिए जरूरी है।
-एयरक्राफ्ट (6.3 अरब डॉलर), मेडिकल डिवाइसेज़ (3.8 अरब डॉलर) और स्पेशलाइज्ड दवाएं (1.4 अरब डॉलर) EU पर भारत की टेक्नोलॉजी निर्भरता दिखाती हैं।
-रफ डायमंड्स, केमिकल्स, प्लास्टिक, स्टील और ऑटो पार्ट्स जैसे इंडस्ट्रियल इनपुट्स भारत की मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा की नींव हैं।
-भारत के EU को निर्यात में रिफाइंड फ्यूल (15 अरब डॉलर), इलेक्ट्रॉनिक्स (11.3 अरब डॉलर), गारमेंट्स, केमिकल्स, स्टील, फार्मा और ऑटो पार्ट्स प्रमुख हैं।
क्लासिक इकोनॉमिक्स है India-EU FTA
GTRI की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत–EU व्यापार को बाजार हिस्सेदारी की लड़ाई नहीं बल्कि प्रोडक्शन पार्टनरशिप के तौर पर देखा जाना चाहिए। EU की मशीनरी, कंपोनेंट्स और प्रिसिजन इनपुट्स भारत की उत्पादकता बढ़ाते हैं। जबकि भारत का बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग मॉडल यूरोप को किफायती उपभोक्ता उत्पाद उपलब्ध कराता है।
इसी वजह से टैरिफ खत्म होने से इंडस्ट्री को बिना कोई नुकसान लागत घटेगी, वैल्यू चेन मजबूत होंगी और व्यापार बढ़ेगा। रिपोर्ट में इसे क्लासिक FTA इकोनॉमिक्स करार दिया गया है।
