भारत-अमेरिका के बीच लंबे समय से बढ़िया व्यापारिक संबंध हैं। और दुनिया में रणनीतिक साझेदार के तौर पर उभरे हैं। दोनों देशों के व्यापारिक संबंध आज केवल द्विपक्षीय लेनदेन तक सीमित नहीं हैं बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन, इन्वेस्टमेंट फ्लो, ट्रेड, टेक्नोलॉजी और डिफेंस को भी प्रभावित करते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल संभालने के साथ ही लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ और सख्त ट्रेड पॉलिसी ने इन रिश्तों को कई बार तनावपूर्ण बना दिया।
आज जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील की संभावनाओं पर चर्चा एक बार फिर तेज है। तब यह समझना जरूरी है कि ट्रंप टैरिफ का भारत के बिजनेस, निर्यात, निवेश और उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा और आगे का रास्ता क्या हो सकता है? हम आपको आंकड़ों के आधार पर समझा रहे हैं कि इस टैरिफ से कारोबार पर वास्तविक असर क्या पड़ा है…
अमेरिकी टैरिफ क्यों बढ़ाए गए?
अप्रैल 2025 में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 10% से बढ़ाकर पहले 25% और फिर अगस्त के आखिर तक 50% कर दिया। इसके पीछे रूस से तेल खरीद, व्यापार में असंतुलन, घरेलू अमेरिकी उद्योगों की सुरक्षा जैसी वजह बताई गईं।
नतीजा यह हुआ कि भारत अब अमेरिका के सबसे ज्यादा टैक्स झेलने वाले व्यापारिक साझेदारों में शामिल हो गया जबकि चीन पर औसतन 30% और जापान पर सिर्फ 15% टैरिफ है।
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भारत-अमेरिका व्यापार: आंकड़े क्या कहते हैं?
अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी ने भारत के निर्यात को बड़ा झटका दिया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की नवंबर के आखिर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में अमेरिका को भारत का निर्यात 28.5% गिर गया। मई 2025 में जहां निर्यात $8.8 अरब था वहीं अक्टूबर तक यह घटकर $6.3 अरब रह गया। यानी सिर्फ 5 महीनों में करीब $2.5 अरब का नुकसान हुआ।
यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 10% से बढ़ाकर 50% तक कर दिए। नतीजतन भारत के आधे से ज्यादा निर्यात अब सबसे ऊंचे शुल्क के दायरे में आ गए हैं।
सबसे ज्यादा मार किन सेक्टरों पर पड़ी?
लेबर-इंटेंसिव सेक्टर (सबसे ज्यादा नुकसान) को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। जिन सेक्टरों में मजदूरों पर निर्भरता ज्यादा है, वही सबसे ज्यादा टूटे:
टेक्सटाइल और गारमेंट्स: 32% गिरावट
केवल गारमेंट्स: 40% गिरावट
जेम्स और ज्वेलरी: 27% गिरावट
इस गिरावट का असर यह हुआ है कि तिरुप्पुर, नोएडा, पानीपत, सूरत जैसे क्लस्टर्स में नौकरी जाने की नौबत आ गई है।
सोलर और ग्रीन एनर्जी
सोलर पैनल निर्यात में सबसे ज्यादा 76% की गिरावट दर्ज की गई है। चीन और वियतनाम पर कम टैरिफ़ होने से अमेरिकी खरीदार वहां शिफ्ट हो गए। इससे भारत का रिन्यूएबल एक्सपोर्ट एजेंडा कमजोर पड़ा।
केमिकल और फार्मा
केमिकल निर्यात: 38% गिरावट
एग्रो-केमिकल्स और एसेंशियल ऑयल्स सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। हालांकि फार्मा अपेक्षाकृत बचा रहा लेकिन ग्रोथ रुक गई।
कृषि और समुद्री उत्पाद
कृषि और खाद्य निर्यात: 45% गिरावट
डेयरी निर्यात: 72% गिरा
झींगा और सीफूड: 39% गिरावट
इस गिरावट का असर यह हुआ कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल जैसे राज्यों में प्रोसेसिंग यूनिट्स और किसानों पर दबाव बना। हैरानी की बात है कि टैरिफ-फ्री प्रोडक्ट्स के निर्यात में भी कमी आई। स्मार्टफोन, दवाएं और पेट्रोलियम जैसे उत्पाद टैरिफ फ्री थे। स्मार्टफोन निर्यात में 36% की गिरावट दर्ज आई।
इस निर्यात में गिरावट के कुछ अहम कारण:
-अमेरिकी मांग में कमजोरी
-लॉजिस्टिक्स और कॉन्ट्रैक्ट अनिश्चितता
-खरीदारों का दूसरे देशों की ओर झुकाव
यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह रोज़गार, फैक्ट्रियों और किसानों से जुड़ा मुद्दा है। अगर अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव जल्द नहीं सुलझा तो भारत अमेरिकी बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी स्थायी रूप से खो सकता है। अब चुनौती सिर्फ टैरिफ की नहीं बल्कि निर्यात रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील क्यों अहम?
आंकड़े बताते हैं कि बिना स्पष्ट समझौते के व्यापार बढ़ तो सकता है लेकिन जोखिम बना रहता है। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील इसलिए अहम है क्योंकि यह सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार बढ़ाने का समझौता नहीं बल्कि निर्यात, रोजगार, निवेश और रणनीतिक साझेदारी से सीधे जुड़ा मुद्दा है।
पहला, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। ऐसे में ऊंचे टैरिफ बने रहने से टेक्सटाइल, गारमेंट्स, जेम्स-ज्वेलरी, केमिकल और कृषि जैसे सेक्टर लगातार नुकसान में रहेंगे। एक ट्रेड डील के जरिए अगर टैरिफ घटते हैं तो भारतीय निर्यातकों को दोबारा प्रतिस्पर्धी बढ़त मिल सकती है।
दूसरा, यह डील लाखों नौकरियों से जुड़ी है। लेबर-इंटेंसिव सेक्टरों में काम करने वाले मजदूर अमेरिकी ऑर्डर पर काफी हद तक निर्भर हैं। टैरिफ हटने या कम होने से तिरुप्पुर, नोएडा, सूरत और पानीपत जैसे औद्योगिक क्लस्टर्स में रोजगार स्थिर हो सकता है।
तीसरा, निवेश का पहलू बेहद अहम है। अमेरिका भारत में टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर और क्लीन एनर्जी में बड़ा निवेशक है।
चौथा, रणनीतिक स्तर पर भी यह डील जरूरी है। वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, चीन पर निर्भरता घटाने और इंडो-पैसिफिक संतुलन में भारत-अमेरिका साझेदारी की भूमिका बढ़ रही है। ट्रेड डील इस रणनीतिक रिश्ते को आर्थिक मजबूती देती है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील टैरिफ़ विवाद से बाहर निकलने का रास्ता है। यह न केवल निर्यात को रफ्तार दे सकती है, बल्कि रोजगार बचाने, निवेश बढ़ाने और भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। एक व्यापक ट्रेड डील से टैरिफ और नॉन-टैरिफ रुकावटें कम होंगी। भारतीय निर्यात में 15-20% तक संभावित वृद्धि हो सकती है। MSMEs को स्थिर बाजार मिलेगा और क्लीन एनर्जी, सेमीकंडक्टर और डिफेंस में संयुक्त निवेश बढ़ेगा।
झटकों से भारत की सीख
ट्रंप टैरिफ ने भारत-अमेरिका व्यापार को केवल नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि उसे री-स्ट्रक्चर भी किया। आंकड़े बताते हैं कि भारत ने झटकों से सीख लेकर अपनी सप्लाई चेन, निवेश रणनीति और घरेलू उत्पादन को मजबूत किया है और कई दूसरे विकल्प खोजे हैं। हाल ही में भारत-न्यूजीलैंड के बीच ट्रेड डील हुई। अब यूरोपीय यूनियन के साथ ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी है।
अब जरूरत है कि भारत और अमेरिका अनिश्चित टैरिफ़ राजनीति से आगे बढ़कर एक डेटा-आधारित, लॉन्गटर्म ट्रेड फ्रेमवर्क तैयार करें। ऐसा हुआ तो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह साझेदारी सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का आधार बन सकती है।
