मोदी सरकार का आखिरी बजट भी देश के सामने पेश कर दिया गया है। आखिरी था, ऐसे में सभी को उम्मीद जरूर रही कि बड़े ऐलान होंगे, चुनावी समीकरण साधने की कवायद दिखेगी। लेकिन सभी को हैरान करते हुए सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। उम्मीदों की आस के साथ टीवी के सामने बैठने वाले मिडिल क्लास को भी निराशा ही हाथ लगी। ना कुछ सस्ता हुआ और ना ही टैक्स स्लैब में कोई बदलाव किया गया। लेकिन अगर मोदी सरकार की रणनीति से देखें तो ये उनकी एक परंपरा का हिस्सा है जो पिछले 10 सालों में मजबूत होती गई है।

असल में मोदी सरकार इस समय एक बहुत ही तगड़े नेरेटिव के साथ आगे बढ़ रही है। वो विपक्ष पर रेवड़ी कल्चर का आरोप लगाकर खुद को ज्यादा बेहतर साबित करना चाहती है। पीएम नरेंद्र मोदी ने ही सबसे पहले इस मिशन को शुरू किया था, उन्होंने कहा था कि देश के लिए रेवड़ी कल्चर खतरनाक है। उन्होंने उन तमाम पार्टियों को जमकर कोसा था जो चंद वोटों के लिए मुफ्त में चीजें बांटने पर जोर देते हैं।

अब समझने वाली बात ये है कि अगर बजट के अंदर मिडिल क्लास को फ्री में या फिर लोक लुभावन तरीके से सरकार कई वादे कर जाती, उस स्थिति में पीएम मोदी के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छिन जाता। कुछ समय के लिए मिडिल क्लास जरूर राहत की सांस लेता, लेकिन चुनाव आते-आते वो उस राहत को भूल जाता और सरकार के पास विपक्ष को घेरने के लिए एक बड़ा मुद्दा भी खत्म हो जाता। अब वो मुद्दा जिंदा रहे, इसी वजह से सरकार ने अपनी अनुशासन वाली परंपरा को जारी रखा।

कहा तो ये भी जा सकता है कि ऐसा अनुशासन जान बूझकर चुनावी साल में दिखाया गया है जिससे सरकार की इमेज बने कि वो कितनी जिम्मेदार है, वो किस तरह से देश हित को चुनावी हितों से अलग रखती है। वो उन सरकारों की तरह नहीं जो चुनाव को देखकर सिलेंडर के दाम घटा दें, मुफ्त में रेवड़ियां बांटना शुरू कर दें। चुनावी नतीजें बताते हैं कि मोदी सरकार की ये सख्त छवि उसे उल्टा मिडिल क्लास के और ज्यादा वोट दिलवाती है, शहरी इलाकों में उसकी जीत होती है।

इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जब देश में नोटबंदी का ऐलान किया गया था, लोगों को कई तकलीफ हुईं, कई जानकारों ने उसे सबसे बड़ा फेलियर बताया, लेकिन सरकार वो परसेप्शन सेट करने में कामयाब हो गई कि उसने भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए ये कड़वी दवाई दी। नतीजा ये रहा कि अगले साल जब यूपी चुनाव हुए, बीजेपी ने प्रचंड जीत दर्ज की। यानी कि जब-जब देश हित को बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है, आम जनता सरकार के साथ मजबूती से खड़ी हो जाती है। वो अपने दुख-दर्द से ज्यादा देश के बारे में सोचने लग जाती है।

मोदी सरकार की इसी रणनीति को लेकर जानकार मानते हैं कि अगर यूपीए कई मौकों पर मिडिल क्लास को फ्री की रेवड़ी बांटने का काम करती थी तो दूसरी तरफ एनडीए की सरकार ‘भविष्य के अच्छे दिन’ वाली लौलीपॉप इसी मिडिल क्लास को लगातार देती रहती है। अभी तक तो सरकार की ये रणनीति सफल मानी गई है, जनता के बीच में पीएम मोदी की छवि और मजबूत हुई है। लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में भी क्या मिडिल क्लास इसी तरह से सोचने वाला है, या फिर अपना गुस्सा दिखा झटका देने वाला है?

अब मोदी सरकार तो पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है। जिस तरह से उसने बजट में कोई बड़ा ऐलान नहीं किया है, वो मानकर चल रही है कि अब सिर्फ भरोसे के फैक्टर पर ही खेलकर फिर सरकार बनाई जा सकती है। इसके ऊपर सरकार को अब अपनी हिंदुत्व वाली रणनीति पर भी जरूरत से ज्यादा भरोसा आ गया है। अयोध्या में शुरू हुई राम लहर धीरे-धीरे पूरे देश में अपना असर दिखा रही है, उसी लहर को बड़ा मुद्दा बनाकर पार्टी सत्ता वापसी की कवायद में है। पीएम मोदी का तो साफ मंत्र दिख रहा है, मंदिर विकास के साथ चार जातियों पर फोकस और लाभार्थी वोटबैंक को संतुष्ट करने की कवायद।

इसका मतलब ये है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से हिंदू समाज को एकमुश्त किया गया, वहीं चार जातियों की बात कर युवा, किसान, महिला और गरीब को साथ लाने का काम हुआ। इसके ऊपर सरकार की योजनाओं से जिन लोगों तक लाभ पहुंचा, उनका वोट तो बीजेपी अपने के लिए पक्का मानकर ही चल रही है। इसी वजह से सरकार वर्तमान में इस मिडिल क्लास को कुछ ना देकर भी इनके वोट की उम्मीद लगाए बैठी है। इसका आधार खुद पीएम मोदी की वो शख्सियत है जो उस राजनीति से प्रेरित है जहां पर देश हित को सबसे ऊपर रखा जाता है।