भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी की मिसाल रहे हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात (Export) बाज़ार है। जबकि भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए तेज़ी से बढ़ता हुआ आयात डेस्टिनेशन बन चुका है। दोनों देशों के बीच सालाना सैकड़ों अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। जिसमें आईटी सेवाओं, दवाइयों, इंजीनियरिंग उत्पादों, ऊर्जा और कृषि उत्पादों की अहम भूमिका रही है। लेकिन साल 2025 में यह संतुलन अचानक डगमगाता दिखा, जब ट्रंप टैरिफ, भू-राजनीतिक फैसलों और दुनियाभर में आर्थिक सुस्ती ने भारत-अमेरिका के बीच व्यापार प्रवाह को गहरी चोट पहुंचाई। आपको बता रहे हैं कि भारत अमेरिका से क्या-क्या खरीदता है और अमेरिका भारत से क्या-क्या खरीदता है?

मई से अक्टूबर 2025 के बीच अमेरिका को भारत के निर्यात में तेज़ गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते टैरिफ ने न सिर्फ भारत के निर्यात मूल्य को घटाया, बल्कि कपड़ा, कृषि, जेम्स-ज्वेलरी और मैन्युफैक्चरिंग जैसे रोज़गार-आधारित क्षेत्रों पर सीधा असर डाला। व्यापार आंकड़ों से साफ है कि यह गिरावट केवल व्यापार घाटे या मुनाफे तक सीमित नहीं है। बल्कि इसका प्रभाव रोज़गार, निवेश और भारत की वैश्विक व्यापार स्थिति पर भी पड़ रहा है। यही वजह है कि भारत-अमेरिका व्यापार संबंध इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़े नज़र आते हैं।

Global Trade Research Initiative (GTRI) की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब 8 महीनों के दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में एक बड़ा झटका देखने को मिला है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है। वहां भेजे जाने वाले भारतीय सामानों में पिछले पांच महीनों में 28.5% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। मई 2025 में जहां भारत ने अमेरिका को करीब 8.8 अरब डॉलर का निर्यात किया था वहीं अक्टूबर तक यह घटकर 6.3 अरब डॉलर रह गया। इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है- अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ (आयात शुल्क) में भारी बढ़ोतरी। अप्रैल में 10% से शुरू हुआ यह टैरिफ अगस्त के आखिर तक 50% तक पहुंच गया जिससे भारत के कई प्रमुख उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई।

टैरिफ क्या है और यह क्यों मायने रखता है?

टैरिफ वह टैक्स होता है जो कोई देश आयात होने वाले सामान पर लगाता है। जब टैरिफ बढ़ता है तो उस देश में सामान महंगा हो जाता है। नतीजतन, वहां के खरीदार सस्ते विकल्प वाले दूसरे देशों की ओर रुख कर लेते हैं। अमेरिका ने 2025 में भारत पर जो टैरिफ लगाया, वह दुनिया के कई बड़े निर्यातक देशों से कहीं ज़्यादा है। उदाहरण के लिए: चीन पर औसतन 30%, जापान पर 15%, जबकि भारत पर कई उत्पादों पर सीधे 50% का टैरिफ है। यही असमानता भारत के लिए सबसे बड़ा नुकसान बन गई।

भारत से क्या-क्या खरीदता है अमेरिका?

GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के अमेरिकी निर्यात को तीन टैरिफ कैटेगिरीज में बांटा जा सकता है:

टैरिफ-फ्री प्रोडक्ट्स (40% हिस्सा)

इनमें स्मार्टफोन, दवाइयां और पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि टैरिफ से मुक्त होने के बावजूद इनका निर्यात भी 25.8% घट गया।

स्मार्टफोन: 36% की गिरावट

पेट्रोलियम उत्पाद: –15.5%

दवाइयां: मामूली गिरावट (–1.6%)

इससे साफ है कि सिर्फ टैरिफ ही नहीं बल्कि बाज़ार में अनिश्चितता और सप्लाई चेन में बदलाव भी असर डाल रहे हैं।

समान वैश्विक टैरिफ वाले प्रोडक्ट्स (7.6%)

इसमें स्टील, एल्युमिनियम, तांबा और ऑटो पार्ट्स आते हैं। इन पर सभी देशों के लिए लगभग समान टैरिफ है। यहां गिरावट 23.8% रही, जिसकी वजह अमेरिकी अर्थव्यवस्था में औद्योगिक मांग की सुस्ती मानी जा रही है।

श्रम-आधारित उत्पाद (52% हिस्सा)
यही वह कैटेगिरी है जिस पर भारत को सबसे बड़ा झटका लगा। इन उत्पादों पर भारत के लिए ही 50% टैरिफ लगाया गया जबकि प्रतिस्पर्धी देशों पर कम शुल्क है। नतीजा यह रहा कि 31% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई यानी सिर्फ पांच महीनों में लगभग 1.5 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।

कपड़ा और गारमेंट उद्योग: रोज़गार पर सीधा असर

भारत का कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट उद्योग करोड़ों लोगों को रोज़गार देता है। लेकिन अमेरिकी टैरिफ ने इस सेक्टर की कमर तोड़ दी। कपड़ा और गारमेंट इंडस्ट्री में कुल 31.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। केवल गारमेंट्स में 40 प्रतिशत से ज्यादा का असर हुआ।

तमिलनाडु के तिरुप्पुर, उत्तर प्रदेश के नोएडा, हरियाणा के पानीपत जैसे इलाकों में ऑर्डर रद्द हो रहे हैं और कंपनियाँ बांग्लादेश, वियतनाम और मैक्सिको की ओर शिफ्ट हो रही हैं। इसका सीधा मतलब है कि नौकरियां जा रही हैं।

जेम्स और ज्वेलरी: चमक फीकी

जेम्स और ज्वेलरी कैटेगिरी में कुल 27% की गिरावट दर्ज की गई। पारंपरिक हीरे के निर्यात में 29 प्रतिशत जबकि सोने की ज्वेलरी में 16 प्रतिशत की गिरावट हुई।

हालांकि लैब-ग्रोन डायमंड ज्वेलरी में थोड़ी बढ़त दिखी, लेकिन कच्चे लैब-ग्रोन हीरों का निर्यात लगभग खत्म हो गया। सूरत और मुंबई जैसे व्यापार केंद्रों पर इसका सीधा असर पड़ा है।

सोलर पैनल: बाज़ार लगभग हाथ से गया

भारत का सोलर पैनल निर्यात 76% गिर गया। वजह साफ है- भारत पर लगा 50% टैरिफ। जबकि चीन और वियतनाम पर केवल 20% टैरिफ है।

नतीजतन, अमेरिकी खरीदारों ने भारत को छोड़कर दूसरे देशों से खरीद शुरू कर दी। यह भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के लिए एक बड़ा झटका है।

केमिकल, समुद्री और कृषि उत्पाद भी प्रभावित

केमिकल निर्यात में 38% की कमी आई। समुद्री उत्पाद (खासकर झींगा) में –39% की गिरावट दर्ज की गई।

कृषि और खाद्य उत्पाद: –45%

डेयरी उत्पाद: –72%

कोको का निर्यात लगभग खत्म हो गया।

मसाले, चाय, कॉफी: –37%

गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश से लेकर केरल और कर्नाटक तक किसान, प्रोसेसर और निर्यातक संकट में हैं।

भारत सरकार के सामने क्या विकल्प?

जीटीआरआई की रिपोर्ट दो बड़ी सिफारिशें की गईं:
Export Promotion Mission को तुरंत लागू किया जाए। यह योजना मार्च में घोषित हुई थी लेकिन अभी तक ज़मीन पर नहीं उतरी। निर्यातकों को सब्सिडी, ब्याज राहत और बाज़ार समर्थन की सख्त ज़रूरत है।

अमेरिका से अतिरिक्त 25% टैरिफ हटाने की मांग की जाए। यह टैरिफ रूस से तेल खरीद से जुड़ा है। अगर यह हटता है तो कुल टैरिफ 50% से घटकर 25% हो जाएगा, जिससे श्रम-आधारित उद्योगों को बड़ी राहत मिल सकती है।

अमेरिकी टैरिफ ने साफ कर दिया है कि वैश्विक व्यापार अब सिर्फ कीमत का नहीं, बल्कि राजनीति और रणनीति का खेल भी है। अगर भारत ने समय रहते कूटनीतिक और नीतिगत कदम नहीं उठाए तो अमेरिकी बाज़ार में उसकी जगह चीन, वियतनाम और अन्य देश स्थायी रूप से ले सकते हैं। यह संकट सिर्फ निर्यात का नहीं बल्कि रोज़गार, किसानों और छोटे उद्योगों के भविष्य का भी है।

अमेरिका से क्या-क्या खरीदता है भारत?

भारत अमेरिका से आयात मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में करता है, जहां या तो घरेलू उत्पादन सीमित है या एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। अमेरिका भारत के लिए ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत बन चुका है- कच्चा तेल और एलएनजी (लिक्विड नेचुरल गैस) का इंपोर्ट भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति विविधीकरण के लिए करता है। इसके अलावा भारत अमेरिका से रक्षा और एयरोस्पेस उपकरण खरीदता है जिनमें अपाचे और चिनूक जैसे हेलिकॉप्टर, विमान इंजन और एडवांस्ड वेपन्स (हथियार) सिस्टम शामिल हैं। इससे दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को भी मजबूत होते हैं।

तकनीकी क्षेत्र में भारत अमेरिका से उच्च-स्तरीय मशीनरी, सेमीकंडक्टर से जुड़े उपकरण, मेडिकल डिवाइसेज़ और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स आयात करता है। इनका इस्तेमाल उद्योग और स्वास्थ्य सेवाओं में होता है। कृषि क्षेत्र में अमेरिकी बादाम, अखरोट, सेब, दालें और कपास भारत के प्रमुख आयात उत्पाद हैं, जिनमें बादाम का हिस्सा सबसे बड़ा है। इसके साथ ही भारत अमेरिका से विशेष रसायन, फार्मा कच्चा माल, प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल उत्पाद भी मंगाता है।

सामानों के अलावा सेवाओं के क्षेत्र में भारत अमेरिकी कंपनियों से आईटी सॉफ्टवेयर लाइसेंस, क्लाउड सर्विसेज, फाइनेंशियल और कंसल्टिंग सर्विसेज तथा इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े भुगतान करता है। कुल मिलाकर अमेरिका से भारत का आयात ऊर्जा, रक्षा, टेक्नोलॉजी, कृषि सर्विसेज पर फोक्सड है जो भारत की आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करता है।

Russian oil bill से 500 प्रतिशत टैरिफ का डर

अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किए गए उस प्रस्तावित प्रतिबंध बिल ने भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। जिसमें रूस से सस्ता तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की बात कही गई है। जीटीआरआई के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भले ही रूस से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देश चीन और भारत हों लेकिन अब तक अमेरिका ने कार्रवाई सिर्फ भारत पर की है जबकि चीन को छोड़ दिया गया है। क्योंकि वॉशिंगटन को डर है कि बीजिंग जवाबी कदम के तौर पर अमेरिका की हाई-टेक और रक्षा उद्योग के लिए ज़रूरी रेयर-अर्थ सप्लाई रोक सकता है।

यही वजह है कि अगर यह बिल कभी पास भी होता है तो उसका व्यावहारिक निशाना चीन नहीं, बल्कि भारत ही बनने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से लगे 50% टैरिफ ने ही भारत के निर्यात को भारी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में 500% शुल्क भारत के अमेरिका को होने वाले 120 अरब डॉलर से ज्यादा के वस्तु और सेवा निर्यात को लगभग ठप कर सकता है जिससे यह मुद्दा सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक और आर्थिक नीति से सीधे जुड़ जाता है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील खतरे में?

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में देरी को लेकर 8 जनवरी 2026 को अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक की टिप्पणी ने असली मुद्दों की बजाय प्रतीकात्मक राजनीति पर ध्यान खींच दिया है। एक इंटरव्यू में लुटनिक ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से फोन न करने के कारण बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता अटक गया। जीटीआरआई ने लुटनिक के इस बयान पर कहा कि यह तर्क न तो तथ्यों पर खरा उतरता है और न ही व्यापार वार्ताओं की वास्तविक प्रक्रिया को दर्शाता है।

सच यह है कि भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत जुलाई 2025 के बाद भी महीनों तक चलती रहीं और टैरिफ, बाज़ार पहुंच, कृषि व डिजिटल नियमों जैसे ठोस मुद्दों पर बातचीत होती रही। ऐसे में एक जटिल बहु-क्षेत्रीय व्यापार समझौते को महज़ एक फोन कॉल से जोड़ना वास्तविक नीतिगत मतभेदों से ध्यान हटाने जैसा है क्योंकि यह गतिरोध व्यक्तिगत कूटनीति नहीं, बल्कि कठिन और अब तक अनसुलझे नीति फैसलों का परिणाम है।