Gujarat Election And Anganwadi Workers: आंगनवाड़ी और प्रशिक्षित सामुदायिक महिला स्वास्थ्यकर्मी यानी आशा कार्यकर्ता देश की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था की रीढ़ हैं। कोव‍िड महामारी के दौरान भी इस बात को इन्‍होंने द‍िखाया। इन मह‍िलाओं ने अदम्य साहस दिखाते हुए बिना किसी लालच या सम्मान पाने की चाहत के टीकाकरण जारी रख कर लाखों बच्‍चों और मांओं की ज‍िंंदग‍ियां बचाईं। मानदेय कम होने के बावजूद उनमें जज़्बे की कमी तब भी नहीं दिखी थी और आज भी नहीं द‍िखती। लेक‍िन, सरकारों का इनको लेकर रवैया उत्‍साहजनक नहीं द‍िखता। चुनावी मौसम में जरूर थोड़ा बहुत इनकी सुध ले ली जाती है। गुजरात में भी ऐसा ही हुआ दिखता है। 

आज भी गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम आद‍ि राज्यों में ये स्वास्थ्यकर्मी गांवों में अनवरत काम कर रही हैं। हाल में गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों के दौरे में इन कर्मचारियों को लगन से काम करते देख कर लगा कि इनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। नर्मदा जिला पूर्ण रूप से आदिवासी जिला है जहां के नर्मदा घाटी में सरदार पटेल की आकर्षक मूर्ति बनाई गई है। गुजरात में 14 आदिवासी जिले हैं जहां ये आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को आप लगन से काम करते देख सकते हैं। 

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को राज्य सरकारें मानदेय देती है जो हर राज्य में अलग-अलग होता है। दिल्ली में जहां यह 12,720 रुपए प्रति माह है और सहायिकाओं का 6810 रुपए है वहीं मध्य प्रदेश में यह 15 से 18 हजार रुपये तक है जबकि वहां सहायिकाओं को 10,000 रुपए से थोड़ा ज्यादा मिलता है। कुछ राज्यों में तो इन्हें पांच-छह हजार रुपए ही मानदेय के रूप में मिलते हैं। इतने कम पैसों में भी वे एक सामाजिक उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण काम करती हैं। कई बार वे आवाज़ भी उठाती हैं लेकिन वे सरकारी कर्मचारी नहीं मानी जाती हैं और इसलिए राज्य सरकारें इन पर उतना ध्यान नहीं देती हैं। इनके काम को देखने के बाद लगता है कि इन्हें अपने काम से ज्यादा सम्मान की चाहत है। 

गांव से दूर जाकर समाज सेवा करती हैं आंगवाड़ी कार्यकर्ताएं

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताएं अपने गांव से दूर जाकर स्वास्थ्य संबंधी कार्य करती हैं। उन्हें अपने परिवार का भी ध्यान रखना पड़ता है। अगर उनके छोटे बच्चे होते हैं तो वह उन्हें किसी के सुपुर्द करके आती हैं। ट्रांसपोर्ट की समस्या हर समय रहती है लेकिन बरसात में यह विकट हो जाती है। साइकिल या पैदल या फिर बैलगाड़ी पर ये आंगनवाड़ी केन्द्रों या फिऱ गांवों में जाती हैं। फिर भी वे शिकायत नहीं करतीं क्योंकि उनमें काम के प्रति एक जज्बा है।

गुजरात के आदिवासी जिले नर्मदा के गाजरगोटा गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता टीना बेन और सहायिका हेमलता बेहन कहती हैं क‍ि वे पैसे की परवाह नहीं करतीं। सुदूर कनबुड़ी गांव में हेमू बेन बसावा ने मानदेय के बारे में बातें करने से इनकार कर दिया। उनका फोकस नवजात शिशु और उनकी माएं हैं। उनके लिए वह दिल से काम करती हैं। इसी तरह से अन्य आंगनवाड़ी केन्द्रों में भी कार्यकर्ताएं बच्चों को दूध बांटती या पोषणयुक्त आहार देती दिखेंगी। वे शिशुओं की मताओं को प्रशिक्षण देती भी दिखेंगी, लेकिन कोई भी मानदेय की बातें नहीं करतीं। यह उनका निजी मामला है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय को 7800 रुपए प्रति माह से बढ़ाकर 10,000 रुपए किया

लेकिन यह बात भी है कि गुजरात में मानदेय को बढ़ाने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को इसी साल सितंबर में धरने पर भी बैठना पड़ा था। इसके बाद ही सरकार ने 51229 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय को 7800 रुपए प्रति माह से बढ़ाकर 10,000 रुपए कर दिया है। सहायिकाओं का मानदेय बढ़ाकर 5500 रुपए कर दिया गया है। अभी उनकी कुछ अन्य मांगों पर सरकार विचार कर रही है। चुनावी साल में इनके मानदेय में हुई बढ़ोतरी 15 सालों में सर्वाध‍िक है। इससे पहले 200, 300, 500 या 700 रुपए की वृद्धि हुआ करती थी। 

गुजरात में 53,029 आंगनवाड़ी केंद्र हैं। इनमें से 1800 म‍िनी सेंटर्स हैं। सरकार ने इन्‍हें भी आंगनवाड़ी केंद्र में अपग्रेड करने की बात कही है। इनमें से ज्‍यादातर आद‍िवासी बहुल इलाकों में हैं। राज्‍य में 51,229 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और इतनी ही सहाय‍िकाएं हैं। वोट बैंक के ल‍िहाज से यह संख्‍या बड़ी ही छोटी है, लेक‍िन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की इस छोटी-सी बिरादरी का द‍िल काफी बड़ा है, है जो सिर्फ एक ही मोटिव से काम करती हैं कि देश के बच्चे उनके ही बच्चे हैं।

(लेखक वर‍िष्‍ठ पत्रकार हैं।)