अगर आपसे कोई कहे कि आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी रुकावट कोई बाहर की परिस्थिति या इंसान नहीं, बल्कि आप खुद हैं, तो शायद पहली प्रतिक्रिया होगी—“ऐसा कैसे?”

ब्रायना विएस्ट अपनी किताब The Mountain Is You में इसी सच्चाई को बड़े सरल और गहरे तरीके से समझाती हैं और बताती हैं कि हम अपना विनाश खुद कैसे करते हैं। आज हम आपको सिर्फ इस किताब के बारे में नहीं बताएंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि जो आधुनिक मनोविज्ञान कहता है, उसे हमारे सनातन में बहुत पहले ही समझाया जा चुका है। मैंने जितनी भी सेल्फ हेल्प बुक्स पढ़ी हैं उसका कोर मैसेज कहीं ना कहीं भगवद गीता में भी मिलता है।

The Mountain Is You किताब का कोर मैसेज भी गीता में है। किताब में लिखा है- हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा काम इसलिए नहीं बन रहा क्योंकि हालात सही नहीं हैं, या हम दुखी हैं क्योंकि किसी ने हमारे साथ गलत किया। लेकिन असली समस्या बाहर नहीं, भीतर होती है। किताब कहती है कि हमारी जिंदगी में सबसे बड़ा पहाड़ हम खुद हैं।

ब्रायना ने इस किताब में कई बार Self-sabotage का जिक्र किया है और बताया है कि ये कोई कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी आदत है। इसका मतलब है कि जब इंसान जानता है कि क्या करना सही है, फिर भी टालमटोल करता है। ब्रायना बताती हैं कि हम यह सब जानबूझकर नहीं करते, बल्कि हमारा दिमाग हमें नए दर्द से बचाने के लिए ऐसा करता है। हम अपनी कंफर्ट को सुरक्षा समझ लेते हैं, भले ही उससे हमारा आत्म-विनाश होता हो। हमारा दिमाग अनजाने बदलाव और सफलता को असुरक्षित मानता है। इससे लड़कर हम कैसे अपना विनाश रोक सकते हैं ये ब्रायना ने अपनी किताब में समझाया है।

उदाहरण के लिए- हमें पता है फिट रहने के लिए जिम जाना या जंक छोड़ना होगा मगर हम फिर वही ये नहीं कर पाते हैं क्योंकि हमारा दिमाग हमें कंफर्टेबल रखना चाहता है।

कैसे हील करें अपना ट्रॉमा?

किताब में ट्रॉमा हीलिंग के बारे में भी गहराई से समझाया गया है, ब्रायना कहती हैं- ट्रॉमा या दर्द से हीलिंग तभी होती है जब हम इमोशंस को महसूस करें, उन्हें दबाएँ नहीं। जो चीज़ हमें ट्रिगर करती है, वही हमारी हीलिंग की चाबी है।

गीता का लेसन भी यही है: जिस दिन आप बाहर की चीज़ों से प्रभावित होकर परेशान होना बंद कर देते हैं और भीतर की शांति खोज लेते हैं, तभी हम मोक्ष की ओर बढ़ते हैं।

भगवद गीता 2.14

“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।”

सुख-दुःख, ठंडा‑गर्म आदि अनुभव अस्थायी हैं। इसलिए ऐसे अनुभवों को सहन करना सीखो। मन को स्थिर रखो, बाहरी चीजों से प्रभावित न हो, तभी अंदर की शांति और मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं।

अपना माउंटेन कैसे पहचानें?

ब्रायना कहती हैं कि जिस लूप में आप बार-बार फंस रहे हैं, वही आपका माउंटेन है। हम सेल्फ‑लव के नाम पर कंफर्ट में रहते हैं, और मेहनत नहीं करना चाहते हैं। लेकिन ब्रायना कहती हैं सच्चा सेल्फ‑लव मतलब आराम नहीं, बल्कि डिसिप्लिन के साथ अपने लक्ष्य पर काम करना है।

गीता के तीसरे अध्याय का श्लोक यही सिखाता है:

भगवद गीता 3.19

“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।”

आसक्ति छोड़े हुए लगातार अपने कर्म करते रहो। बिना मोह या बहाने के अपने लक्ष्य पर काम करना ही सच्चा आत्म-प्रेम और विकास का मार्ग है।

आदतें नहीं पहचान बदलें

ब्रायना कहती हैं- “सिर्फ आदतें बदलना काफी नहीं है। आपको यह भी तय करना होगा कि आप कौन हैं।”

आदतें यानी पहाड़ चढ़ने के लिए छोटे-छोटे कदम और पहचान का अर्थ है कि कौन है जो इस रास्ते पर चल रहा है। अगर आप सिर्फ आदतें बदलते हैं लेकिन अपनी पहचान नहीं बदलते, तो बदलाव टिकाऊ नहीं होगा। पहले आपको अपनी आइडेंटिटी बदलनी होगी और खुद को वो इंसान बनाना होगा जो अपने फ्यूचर सेल्फ के लिए डिसिप्लिन से काम करता है।

गीता भी पहचान पर बात करते हुए हमें सिखाती है- आप शरीर, मन, अहंकार या दर्द नहीं हैं, बल्कि उन्हें अनुभव करने वाला साक्षी हैं।

भगवद गीता 13.27

“संज्ञा बुद्धिर उपयोगः कर्मावबोधनं च। अहंकार एव च क्षणोऽहम् अनुभूतिर्न साक्षि।।”

इंद्रियां, ज्ञान, बुद्धि, कर्म की समझ और अहंकार क्षणिक हैं। लेकिन साक्षी वही है जो इन सबको अनुभव करता है।

हीलिंग कैसे होगी?

किताब बताती है कि हीलिंग आरामदायक नहीं होती। अगर आसान लग रही है, समझ लो अभी असली काम शुरू नहीं हुआ है। हमें पहले फ्यूचर सेल्फ का विज़न बनाना होगा और उसके बाद हम जो भी फैसला लें ये सोचकर लें कि इससे आप अपने फ्यूचर वर्ज़न तक कैसे पहुंचेंगे। साइकोलॉजी बताती है कि हमारा दिमाग हमेशा फैमिलियर चुनता है, भले ही वह हमें दर्द दे। यही कारण है कि हम पुराने पैटर्न दोहराते हैं। उन पैटर्न्स को तोड़कर हमें अपना विनाश रोकना होगा।

गीता भी यही समझाती है कि हम खुद ही अपने फैसलों से अपना उद्धार और पतन दोनों कर सकते हैं:

भगवद गीता 6.5

“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।”

मनुष्य स्वयं ही अपना उत्थान करता है और स्वयं ही अपना पतन।

ज़िम्मेदारी और आत्म‑प्रेम

ब्रायना अपनी किताब में कहती हैं- हीलिंग का मतलब है दर्द से भागना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी लेना है। वो कहती हैं- “यह मत कहो कि मैं परेशान हूँ। कहो- मेरे जीवन में एक परेशानी है।”

गीता भी यही सिखाती है कि आप अपनी समस्या नहीं हैं, आप उससे कहीं ज़्यादा हैं। और जो ये सब महसूस कर रहा है वो कभी नष्ट भी नहीं होता है। वो जन्म-जन्मान्तर सीखता रहता है।

भगवद गीता 2.20

“न जायते म्रियते वा कदाचित्।”

आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।

कंफर्ट ज़ोन छोड़ना

दिमाग हमें सुरक्षित महसूस कराता है, इसलिए कुछ नया करना हमें डराता है। ब्रायना कहती हैं कि Self-love का मतलब आराम नहीं, ईमानदारी और जिम्मेदारी से काम करना है। आप अपने पैटर्न को समझकर खुद पर काम करना शुरू कर सकते हैं। और भगवद गीता तो हमें हर अध्याय में कर्म करने की बात ही समझाती है। श्रीकृष्ण हमें समझाते हैं कभी देर नहीं होती। नई शुरुआत हमेशा संभव है।

भगवद गीता 2.47

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता मत करो।

भगवद गीता 18.66

“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”

मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें संभाल लूँगा।

देखा जाए तो ब्रायना विएस्ट की किताब The Mountain Is You और भगवद गीता दोनों यही बताते हैं कि शत्रु बाहर नहीं, भीतर होता है और Self-sabotage यानी हमारे पुराने पैटर्न, मोह और डर से लड़कर ही हम हीलिंग या मोक्ष तक पहुंच सकते हैं। बस खुद का सामना करो, खुद को पहचानो और लगातार ईमानदारी से कर्म करते रहो।

ज़िंदगी का सबसे कठिन सफ़र बाहर का नहीं, भीतर का होता है।

इंटरनेशनल बेस्ट सेलर बुक ‘द माउंटेन इज़ यू’ इंग्लिश के साथ हिंदी में भी उपलब्ध है। ये किताब Manjul Publishing House से पब्लिश हुई है।