रात की खुमारी टूटी नहीं है। अपराजिता की रात भर की शरारतें झेलने के बाद आखिरकार रूह की जीत हुई। देह का मिलन तो कुछ पलों का है, मगर रूह का मिलन तो शाश्वत है। नाश्ते और चाय के बाद अपराजिता ने अपनी पलकें झुका कर नीलाभ को ही नहीं, उसकी भावनाओं को भी आत्मसात कर लिया। अपने शब्दों में हरसिंगार की सुगंध समेट कर वह बोली, आप सच कहते हैं, स्त्री-पुरुष के बीच देह नहीं, प्रेम ही अंतिम मंजिल है। मैं जानती हूं कि आपके लिए मेरा स्पर्श और मेरा चुंबन मायने नहीं रखता। आप दिल से संत हैं। यह संत भाव हर पुरुष में होना चाहिए, पर आप मुझे देवी का दर्जा न दें बल्कि मेरे सहचर बनें। धरती के इस छोर से अंतिम छोर तक मेरे साथ चलते रहिए, चलते रहिए….। कुछ मैं आप में रहूं और कुछ मुझ में रह जाएं आप। रहेंगे न मेरे साथ? ……स्त्री-पुरुष संबंधों की इससे सुंदर भावना क्या हो सकती है। चलते समय अपराजिता नीलाभ के गले लग कर गुनगुना उठी-
प्यार कभी मरता नहीं, हम तुम मरते हैं…..।

अपराजिता बदल रही है। हमें इस धरती की करोड़ों अपराजिताओं को सुरक्षित रखना है और उन्हें यह महसूस कराना है कि यह दुनिया उसी की बनाई है। और वह आपके बीच सुरक्षित है। और हमारी बच्चियां ही नहीं बच्चे भी महफूज हैं। मगर क्या हम उन्हें यह भरोसा दे पाएंगे।

……. नहाने के बाद छत पर सूर्य को अर्ध्य देते समय सूरज ने बादलों से झांकते हुए कहा, तुम्हारी भावनाओं से मैं प्रसन्न हूं पुत्र। हर कोई तुम्हारी तरह सोचना शुरू कर दे, तो दुनिया की तस्वीर बदल सकती है। नीलाभ ने सूर्यदेव को जल अर्पित करते हुए कहा, हां प्रभु, यह शुरुआत अवश्य करूंगा। लेकिन आप तो सात घोड़े वालेरथ पर सवार होकर धरती के कोने-कोने पहुंच जाते हैें, फिर स्त्रियों के प्रति शातिर और पशुओं से भी अधिक हिंसक हो रहे पुरुषों को भस्म क्यों नहीं कर देते?…… इस धरती पर तो आप साक्षात भगवान हंै। आपकी नजरों से कौन बच पाया है भला? …… निर्मल जल की धार के बीच सूर्यदेव अपने सात रंगों के साथ झिलमिला उठे हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, सच कहा पुत्र। मगर इस धरती पर हर तीसरे-चौथे पुरुष को भस्म करना होगा। यह संभव नहीं। तुम मेरे रथ का आठवां घोड़ा बन जाओ। और अपने शब्दों की रश्मियों से हिंसक हो रहे पुरुषों में प्रेम की पावनता भर दो। उन्हें देह से विरक्त कर दो। …..यह कहते हुए सूर्य ने नीलाभ में उष्मा भर दी है।

सीढ़ियों से उतरते हुए नीलाभ को लगा कि वह सचमुच सूरज का आठवां घोड़ा हो गया है। उसमें अनूठी ऊर्जा भर आई है। उसे अपराजिता की याद आ रही है। …..तुम मेरा साथ दोगी न? अब एक बड़ा काम करना है। इस निरीह दौर में हमें प्रेम बांटना है। अपराजिता का मुस्कुराता हुआ चेहरा सामने आ गया है। वह कह रही है, आप न सच में बुद्ध हैं। अब तो सूरज का आठवां घोड़ा भी बन गए हैं। कहां ढूंढती रहूंगी आपको। नीलाभ ने मन ही मन कहा, कहीं नहीं जा रहा तुम्हें छोड़ कर। मैं अपनी सारी रश्मियां भर दूंगा तुम में। खुद में एक ऐसी ऊर्जा महसूस करना जो नाउम्मीदियों के अंधेरे में उम्मीदों का उजाला भरेगी। यही उजाला तुम हर स्त्री में भरना। उन्हें हौसला देना कि वे कोमल जरूर हैं मगर कमजोर नहीं। वह केवल देह नहीं, जिसका कोई पुरुष आखेट करे। इसलिए चुप नहीं रहना है। प्रतिरोध करने का हौसला उन्हें देना है। सुन रही हो न तुम? …… हां सुन रही हूं मित्र। नीलाभ और अपराजिता साथ न होकर भी कभी-कभी इसी तरह मौन संवाद करते हैं।

आज कॉफी के साथ पोहे का नाश्ता करते हुए अपराजिता फिर चली आई है मन के किसी कोने में। उसके मृदुल स्पर्श से मन पुलकित हो उठा है। …… मैं सूरज का आठवां घोड़ा हूं। शब्दों की रश्मियां बिखेरते हुए चलना है मुझे। कॉफी की अंतिम घूंट अब कड़वी लगने लगी है। अपराजिता सामने होती तो मिठास घोल देती। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी। दूसरी तरफ ड्राइवर है- सर, बेटे को बहुत बुखार है। आज मैं छुट्टी कर लूं? नीलाभ ने जवाब दिया- जाओ डॉक्टर को दिखा दो। पैसे की जरूरत हो तो ले जाना। उसकी बात सुन कर चंदर भावुक हो गया। इतना ही कह पाया, शुक्रिया जनाब। जरूरत पड़ी तो ले जाऊंगा। …..जरूर चंदर। संकोच मत करना। यह कहते हुए नालाभ ने अपने चालक के दिल में मानवीय सरोकार की गांठ मजबूत कर दी है।

अपने न्यूज चैनल तक जाने के लिए मेट्रो से बढ़ कर कोई साधन नहीं। सूरज के आठवें घोड़े को इसी की सवारी करनी पड़ेगी, यह सोच कर नीलाभ मन ही मन हंसा। आॅटो वाले ने उसे मॉडल टाउन मेट्रो स्टेशन उतार दिया है। सीढ़ियां चढ़ते हुए उसके कदम प्लेटफार्म के अंतिम छोर की ओर बढ़ चले हैं। अपराजिता तो उसे ब्रह्मांड के उस पार ले जाना चहती है। …….अब तुम ले ही चलो मित्र। थक गया हूं इस देह के साथ। दुखों से पार पाना है तो विदेह हो जाना चाहिए। नीलाभ दार्शनिक हो गया……. हम दोनों के रूह बादलों के बिस्तर पर विश्राम करेंगे। हमारा मिलन वहीं होगा। फिर अंतरिक्ष में सितारे बन कर चमकेंगे।

हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो के आने की उद्घोषणा हो रही है। अंतिम डिब्बे के दरवाजे खुल गए है। लगभग खाली कोच में सन्नाटे की बर्फ जमी है। नीलाभ कोने की सीट पर बैठ गया है। उसने आंखें बंद कर ली है। आज नोट पैड पर कविताएं लिखने का मन नहीं है। सच तो यह है कि परिष्कृत भाषा में प्रेम कविताएं लिखने वाले कवियों की जमात में शामिल होने की भी इच्छा नहीं। न कहीं छपने की अभिलाषा है। अभी मन बहुत खिन्न है। नीलाभ सोच रहा है, आज धरती के हर हिस्से में रह रहे समाज को प्रेम की जरूरत है। सद्भाव और सहभागिता की जरूरत है। सूरज के इस आठवें घोड़े को शातिर और हिंसक हो रहे मनुष्यों को पहचानना है। उन्हें सहज-सहृदय बनाना है। ……. उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन गुरुतेग बहादुर नगर है।

नीलाभ ने फेसबुक खोल लिया है। यहां विचार कम चेहरे ज्यादा है। ज्यादातर पर मुखौटे चढ़े हुए। इन दिनों सवाल उठ रहे हैं। स्त्रियों के प्रति हिंसा और यौन शोषण पर हिंदी के अधिकांश बड़े नाम चुप क्यों हैं। उनकी यह चुप्पी शातिर लगती है। कुछ खास लोगों के लिए वे मुंह खोलते हैं। जब आरोपी उन्हीं के बीच का होता है तो वे चुप्पी की चादर ओढ़ लेते हैं। कुछ तो करना होगा। नीलाभ ने आउटपुट हेड को फोन लगाया है। घंटी बजते ही अजय दूसरी ओर था, सर आफिस आ रहे हैं? आ रहा हूं अजय। मगर मेरे पहुंचने से पहले एक काम करो। कल जो बिग बॉस में जिन प्रतियोगितयों ने बचपन में अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की जो बात बताई थी। उन सब को मिला कर स्टोरी तैयार करो। एक रिपोर्टर को ऐसे मामलों में रिसर्च के लिए लगाओ। जी सर, अजय ने जवाब दिया।

…… उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन दिल्ली विश्वविद्यालय है। दरवाजे खुल गए हैं। देश का युवा अकसर यहां दिखता है। लोकतांत्रिक और उदार युवा भारत की तस्वीर है यहां। कई युवा विद्यार्थी कोच में सवार हो गए हैं। एक छात्र अपनी मित्र के कंधे को दबा रहा है। शायद उसकी मांसपेशियों में दर्द है। इनकी मित्रता में कितनी सहजता है। एक दूसरे के छूने में भी मैत्री भाव है। एक दूसरे के लिए फिक्र भी। हो सकता है कि दूसरों को यह लग रहा हो कि यह जोड़ा कितना बेसब्र है? किस तरह साथ चिपक कर खड़े हैं। ….. ज्यादातर यात्री उन्हें ही देख रहे हैं। हालांकि ऐसे दृश्य अब आम हैं। फिर भी हम कहां उदार हो पाए हैं। हम तो यौन उत्पीड़न पर खामोश रहना जानते हैं। मगर आज के युवा अब बर्दाश्त नहीं करते। उनकी चुप्पी सेलेक्टिव नहीं। खुद का उत्पीड़न हो या किसी और का? वे खुल कर सामने आते हैं। ….अगला स्टेशन विधानसभा है, इस उद्घोषणा ने नीलाभ का ध्यान भंग कर दिया है।

सत्ता केंद्र से सटे इस स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुल गए हैं। यहां से एक भी यात्री सवार नहीं हुआ है। मेट्रो फिर चल पड़ी है। इसके साथ ही नीलाभ के मन की यात्रा भी। कुछ समय पहले वडोदरा से खबर आई थी कि शादी की रात एक दुलहन के लिए कैसे बुरे सपने में बदल गई। उस खबर में बताया गया था कि अपने हमसफर के लिए सपने संजोने वाली युवती के लिए दूल्हा किस तरह दरिंदा साबित हुआ। शादी की पहली ही रात दूल्हे ने पॉर्न दिखा कर अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए मजबूर किया। हैरत है कि दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे। क्या लड़के में इतनी भी समझ नहीं थी कि लड़की कोई प्लस्टिक की गुड़िया नहीं कि उससे जैसे चाहे खेल लो। यह किसी भी लड़की की गरिमा के खिलाफ तो है ही, यौन शोषण की भी पराकाष्ठा है। अगर कोई ऐसा करता भी तो निश्चित तौर से वह मनोरोगी है और इस समाज का अपराधी भी। ……. अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है, कोच में हो रही उद््घोषणा ने नीलाभ का ध्यान भंग कर दिया है।

कोच के दरवाजे खुल गए हैं। चंद यात्रियों के साथ एक अधेड़ सज्जन भी सवार हुए हैं। उसकी लोलुप नजरें छोटे कद की बेहद ही युवा छात्रा पर है। लगता है जैसे इस बच्ची को खा ही जाएगा। उसकी आंखों में भयावह यौनिकता को पढ़ा जा सकता है। नीलाभ ने सोचा एक ऐसे ही शख्स ने उसे भी तो इसी तरह देखा था जो लड़की या लड़के में भेद भी नहीं कर पाया। उसे अकेला पाकर अपने कमरे में बंद कर लिया था। वह चीख भी नहीं पाया। सांसें घुट कर रह गई थी। वह अपने बड़े भाई के पास पढ़ने आया था। नाम था नरेश। देखने में भोलाभाला। बड़े भाई का ताबेदार और भाभी का आज्ञाकारी देवर। मगर भीतर से यौन पिपासु और मनोरोगी भी। चौथी क्लास के बच्चे को कमजोर पाकर और पढ़ाने के बहाने वह जब-तब कमरे को बंद कर लेता था……।

चांदनी चौक स्टेशन आने पर नीलाभ का ध्यान यात्रियों की ओर चला गया है। वह युवा लड़की अपने साथी के कंधे पर सिर रख कर निश्ंिचत है। वह खुद को महफूज महसूस कर रही है। स्त्रियां अपना सहचर ऐसा ही चाहती हैं जो देह का स्पर्श करे, तो उसकी गरिमा का खयाल रखे। कोई खिलवाड़ न करे। उसके स्वाभिमान को ठेस न पहुंचाए। उधर, उस बच्ची पर अधेड़ की वीभत्स नजरें अब तक गड़ी हुई हैं। नीलाभ के जी में आया कि सीट से उठ कर उसे तमाचा जड़ दे। याद आया वह नरेश भी। अगर आज वह सामने आ जाए तो उसे सबके सामने इतना मारेगा कि किसी को मुंह दिखाने लायक न बचे। मगर अब कहां होगा वह? क्या पता नाती-पोतों को गोद में खिला रहा होगा। क्या वैसा ही कुछ पोतियों या पोते का साथ भी करने का खयाल आता होगाा उसे? जैसे कि उसने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले निरीह और कोमल बच्चे के साथ किया।

नीलाभ की आंखें भीग गई हैं। उसने अपनी मुट्टियां कस ली हैं। अपना गुस्सा कहां उतारे वह। आज इस मुद्दे पर स्टोरी चलाऊंगा नेशनल चैनल पर। इस पर जागरूकता लाना जरूरी है। घरों में घुसे, बसों-ट्रेनों सड़कों, पार्कों और सुनसान जगह घात लगाए ऐसी मनोरोगियों से अकेले पुलिस नहीं निपट सकती। इसके लिए अभिभावकों, मनोचिकित्सकों और स्कूलों को मिल कर प्रयास करना होगा। ……. इस बीच राजीव चौक स्टेशन आने की उद्घोषणा हो रही है। नीलाभ सीट से उठ गया। सहसा मोबाइल की घंटी बज उठी है। यह अपराजिता की कॉल है। उसने रिसीव करते ही पूछा, कहां हैं आप? कुछ खाया? नीलाभ ने कहा, कॉफी और पोहा। ओ मिस्टर, इससे अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएंगे? बनने चले हैं सूरज का का आठवां घोड़ा। आफिस पहुंचिए। मैंने आपकी टेबल पर गाजर का हलवा और और रोटी सब्जी पैक करा कर रखा है। सब खा लीजिएगा। छोड़िएगा नहीं। अच्छा….अच्छा। खा लूंगा मित्र। अभी रास्ते में हूं, नीलाभ ने जवाब दिया।

राजीव चौक स्टेशन आ गया है। कालेज के छात्र और छात्राएं सभी कोच से बाहर आ गए हैं। उधर, अधेड़ ने बच्ची जैसी दिखने वाली कॉलेज छात्रा का अपनी निगाहों से पीछा नहीं छोड़ा है। यह हर दूसरे-तीसरे पुरुष की फितरत है। और हर चौथा-पांचवां पुरुष घात लगाए रहता है। हमें ऐसे पुरुषों की मनोवृत्ति को बदलना है। कैसे बदलेंगे हम? यह प्रयास तो हम सबको करना होगा। लड़कियों को किसी भी तरह के प्रलोभन से बचना होगा।

…….. नीलाभ को नोएडा की मेट्रो मिल गई है। सेक्टर-16 स्टेशन से उतरते हुए गेट पर चंदर मिल गया। ….अरे तुम। बेटे को डॉक्टर के पास ले गए थे? यहां आए क्यों? चंदन ने कहा, सर बच्चा ठीक है अब। सोचा आपको दिक्कत होगी, यही सोच कर चला आया। चलिए गाड़ी बाहर खड़ी है।

…… चैनल दफ्तर के सामने गाड़ी रुक गई है। नीलाभ अपने केबिन की ओर तेजी से बढ़ गया। उसकी टेबल पर करीने से पैक गाजर का हलवा रखा है। टिफिन में सब्जी-रोटी भी है। उसने खाने के बाद कॉफी मंगवाई है। नीलेश को मीटिंग के लिए बोल दिया है। कुछ ही देर में इनपुट एडिटर अजय, तीनों आउटपुट एडिटर और सीनियर प्रोडयूसरों के साथ एंकर मोनिका भी आ गई। कांफ्रेंस रूम में सभी बैठ गए हैं। नीलाभ की नजरें अपराजिता को तलाश रही हैं। वह कहां गई है? उसके चेहरे को भांप कर मोनिका ने कहा, अपराजिता कुछ देर के लिए बाहर गई है सर। उसकी बातों को तवज्जो न देते हुए नीलाभ ने मीटिंग शुरू की।

‘……आज यह बैठक इसलिए बुलाई गई है कि हम यह तय करें कि मीडियाकर्मी होने के नाते हमारा क्या दायित्व है। हम इक्कीसवीं सदी के ऐसे दौर में जी रहे हैं जो आदिम युग की याद दिलाती है। टेक्नॉलॉजी ने हमारी जिंदगी की रफ्तार बढ़ा दी है, मगर हमारी सोच हजारों किलोमीटर पीछे चली गई है। हम मानवीय से अमानवीय हो गए हैं। हमारी संवेदनाएं मर रही हैं। पैसे और देह की भूख ने मानव को दानव में बदल दिया है। हम इस समाज को कैसे संवेदनशील बनाएंगे? आज यह सोचना है। मैं चाहता हूं कि फिल्मी मनोरंजन की खबरों के बजाय हम मानवीय सरोकार पर कार्यक्रम तैयार करें। हमारा पहला कार्यक्रम बच्चों से यौन दुर्व्यवहार पर होगा।’ मीटिंग में सभी नीलाभ का मुंह ताक रहे हैं।

अचानक नीलाभ ने एक सवाल दाग दिया- आप में से किस-किस के साथ चाइल्ड अब्यूज हुआ है? अपने चैनल हेड के इस औचक सवाल से सभी सकपका गए हैं। सब ने चुप्पी ओढ़ ली है। किसी के साथ नहीं हुआ? नीलाभ के यह कहने पर सब ने सिर झुका लिया। कुछ नजरें चुराने लगे। ‘कोई बात नहीं। मत बताइए आप लोग। आप से अच्छे तो बिग बॉस में आए वे कंटेसटेंट हैं, जिन्होंने आपबीती बताई और उसे लाखों-करोड़ों लोगों ने सुना। चलिए मैं बता देता हूं। मेरे साथ चाइल्ड अब्यूज हुआ। हां मेरे साथ हुआ। सुन रहे हैं आप।’ ….. अपने चैनल हेड की बात सुन कर सब अवाक रह गए। एंकर मोनिका ने कहा, ‘सर क्या कह रहे हैं? लोग सुनेंगे तो आप को अजीब नजरों से देखेंगे। मत बताइए ये सब। प्लीज सर।’ मोनिका फफक पड़ी है। मीटिंग में सन्नाटा पसर गया है। नीलाभ की लाल हो गई आंखों से आंसू बह निकले हैं। उसने अपने माथे पर हाथ रहते हुए कहा- अजय जो स्टोरी तैयार होगी, उसमें तमाम शख्सियतों के साथ तुम मेरी भी बाइट ले लेना। मैं बताऊंगा कि बाल यौन दुर्व्यवहार कितना भयावह होता है। बच्चों पर इसका आजीवन क्या प्रभाव पड़ता है, यह बताऊंगा। अब आप सब जाइए। शाम के बुलेटिन में जुट जाइए।

साथी कमरे से बाहर निकल गए हैं। टेबल पर नीलाभ का सहायक कॉफी बना कर रख गया है। उसने केबिन की खिड़की खोल दी है। धड़धड़ाते हुए सूरज दादा कमरे में आ गए हैं। केबिन में रश्मियां बिखर गई हैं। नीलाभ ने आसमान की ओर निहारा। सात रथों पर सवार सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी सौम्य और सुनहरी धूप से उसके सिर को सहलाते हए कहा, मेरा आठवां घोड़ा बुराइयों के अंधकार को दूर कर रहा है। नीलाभ ने आंखें बंद करते हुए कहा, हां प्रभु। ….और उसने आंखें बंद कर ली है। चुस्कियों में कॉफी हलक के नीचे उतर रही है। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी। पिक करते ही दूरी तरफ से आवाज आई, लंच कर लिया आपने। गाजर का हलवा कैसा लगा। नीलाभ ने कहा, एकदम मस्त। तुमने बनाया? तो और कौन बना कर लाएगा आपके लिए, अपराजिता ने कहा। इस पर नीलाभ ने कहा, अभी कहां हो? मैंने आज मीटिंग बुलाई थी। तुम कहां निकल गई? …..अपरा ने जवाब दिया, दिल्ली में सात साल की बच्ची से बलात्कार की खबर है। आरोप एक बाबा पर लगा है। वही कवर करने निकली हूं। अच्छा तो अपना काम करो, नीलाभ ने जवाब दिया।

कुछ देर बाद केबिन में लगे स्क्रीन के नीचे पट्टी पर खबरें चलनी शुरू हो गई हैं। एक खबर महाराष्ट्र से आ रही है- ठाणे में नौ साल के बच्चे से यौन दुराचार। मां ने शिकायत दर्ज कराई। पिता पर मुकदमा दर्ज। आरोपी को गिरफ्तार करने की कोशिश। …….. ओह। अब पिता भी! कितना दुखद। कैसा समाज हो गया है। घर में भी अपने ही लोग अपराधी बन कर बैठे हैं।

उधर, खबरें शुरू हो गई हैं। राष्ट्रीय खबरों के बाद दिल्ली में बलात्कार की घटना पर एंकर मोनिका पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर उतरी भीड़ से सवाल करती अपराजिता से बात कर रही है। लोग जागरूक हो रहे हैं। यह अच्छी बात है। हम सब पहल करें। लड़कियों और बच्चों को जागरूक करें तो हम एक सुरक्षित समाज तैयार कर सकते हैं। क्या यह संभव नहीं?

कुर्सी से उठ कर नीलाभ ने केबिन की खिड़कियां बंद करने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, सिंदूरी रंग से नहा रहे सूरज ने टोकते हुए कहा, अब बैठने का वक्त नहीं। तुम मेरे रथ के आठवें घोड़े हो। तुम्हें भी रोज चलना है। उम्मीदों की रश्मियां बिखेरना है। तुम अपनी तरह हजारों और लाखों लोग तैयार करो जो इस धरती को स्त्रियों के लिए सुरक्षित बनाएं। …….हां प्रभु……अवश्य। नीलाभ खिड़कियों को बंद कर अपनी सीट पर बैठ गया। पास ही रखे कागज को उठा कर लिखने लगा-
मैं-
उम्मीदों का सूरज हूं
हर सुबह आऊंगा
एक नई दुनिया रचूंगा
शब्दों की रश्मियों के साथ।