शशिप्रभा तिवारी
भरतनाट्यम नृत्यांगना प्रिया वेंकटरामन एक लंबे अर्से से दिल्ली में निवास कर रही हैं। वे एक अच्छी नृत्यांगना हैं और गुरु भी। वे गुड़गांव में काफी समय से भरतनाट्यम नृत्य युवा और किशोर शिष्याओं को सिखाती रही हैं। इन दिनों वे गुड़गांव के सिद्धि गणेश मंदिर में नियमित रूप से नृत्य की शिक्षा देती है , जो एक तरह से मंदिर परंपरा से जुड़ी इस विधा की ओर सहज ही हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण के प्रचलित शास्त्रीय नृत्य का उद्गम मंदिरों से ही हुआ और देवताओं के अष्टयाम सेवा में नृत्य के जरिए भी उन्हें प्रसन्न किए जाने का रिवाज रहा है। प्रिया ने इस परंपरा को अपने प्रयासों से पुनर्जीवित किया है।
भरतनाट्यम नृत्यांगना प्रिया वेंकटरामन देश और विदेशों में होने वाले विभिन्न नृत्य समारोहों में शिरकत कर चुकी हैं। वे बताती है कि मेरे नृत्य से प्रभावित होकर, कई युवा विदेशों से सीखने आते हैं, खासतौर पर गरमी की छुट्टियों में। वैसे कुछ तो नियमित तौर पर पिछले बारह वर्षों से नृत्य सीख रहे हैं। इन्हीं युवा और किशोर शिष्याओं ने नृत्य समारोह ‘डांस कलाइडोस्कोप’ के आयोजन में नृत्य पेश किया। इस समारोह का आयोजन शिव नादर स्कूल के सभागार में किया गया।
समारोह का आरंभ मल्लारी से हुआ। यह राग नाटई और अट ताल में निबद्ध था। इसकी परिकल्पना प्रिया ने अनन्या नृत्य उत्सव के लिए की थी। इस एकल नृत्य को सामूहिक नृत्य में रूपांतरित किया। दूसरे सामूहिक नृत्य की पेशकश स्वरकटु के रूप में हुई। यह राग मालिका और खंड ताल में निबद्ध था। अगली प्रस्तुति जतीस्वरम थी। यह राग अड़ाना और रूपक ताल में निबद्ध था। भरतनाट्यम की तकनीकी पक्ष को इन प्रस्तुतियों में शिष्याओं ने पेश किया। उनका आपसी तालमेल और संतुलन अद्भुत था।
नृत्य समारोह डांस कलाइडोस्कोप में शिष्याओं ने महाराजा स्वाति तिरुनाल की रचना पर नृत्य पेश किया। रचना ‘शंकर श्री गिरि’ राग हंसध्वनि और आदि ताल में निबद्ध था। इसकी नृत्य परिकल्पना प्रिया वेंकटरामन ने की थी। अगली प्रस्तुति वरणम थी। इसमें वृहदेश्वर के भगवान शिव की कहानी को पिरोया गया था। भगवान वृहदेश्वर के प्रति नायिका के भावों का यह विवेचन अनूठा था। एकल नृत्य को सामूहिक नृत्य में पिरोना चुनौतिपूर्ण था। लेकिन, इसे नृत्यांगना प्रिया ने बखूबी कोरियोग्राफ की और शिष्याओं ने भी उतनी गरिमा के साथ इसे पेश किया। यह वरणम राग शंकराभरणम और आदि ताल में निबद्ध था।
संत पापनाशम शिवन के पदम पर भावों को पेश किया गया। यह नृत्य राग हंसानंदी और आदि ताल में निबद्ध था। नृत्य समारोह का समापन तिल्लाना से हुआ। बाला मुरली कृष्ण रचित तिल्लाना आदि ताल में निबद्ध था। शिष्याओं ने इस प्रस्तुति में मोहक पद, हस्त और अंग संचालन पेश किया। भरतनाट्यम की लयात्मक और गत्यात्मक गतियों ने प्रभावकारी माहौल बना दिया।
