कश्मीरनामा
अशोक कुमार पांडेय की यह पुस्तक इस नर्क के फैलने की कथा विस्तार से कहती है। यह कथा ‘नीलमत पुराण’ जैसे पौराणिक संदर्भों और ‘राजतरंगिणी’ जैसे पारंपरिक इतिहास-ग्रंथों से आरंभ होकर नवीनतम शोध और विवादों तक आती है। कथा का थोड़ा विस्तृत हो जाना लाजिमी था, लेकिन कश्मीर के समकाल की सही समझ के लिए वहां के इतिहास की जानकारी और समझ अनिवार्य है। कश्मीर के इतिहास, भूगोल और समकाल की कथा सुनना जरूरी है, ताकि हम कश्मीर को सिर्फ ‘समस्या’ नहीं बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में पहचान पाएं जहां हमारे जैसे ही नागरिक रहते हैं, जिनका जीवन-मरण उस जगह के विशिष्ट इतिहास और भूगोल से प्रभावित होता है।
‘कश्मीरनामा’ की खूबी यह है कि सवाल सांप्रदायिकता का हो या कश्मीर की सामाजिक संरचना और उसके ऐतिहासिक विकास का, इतिहास के मूल्यांकन का हो, या भविष्य की कल्पना का- सरलीकरणों के बजाय किताब तथ्यों, प्रमाणों और उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों पर भरोसा करती है। सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के प्रति संवेदनशील रहते हुए भी, अशोक उनके निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया और सामाजिक गतिकी के आर्थिक-भौतिक पहलू को कहीं भी ओझन नहीं होने देते। वे सांस्कृतिक अस्मिता के सवालों को आर्थिक-सामाजिक ढांचे के संदर्भ में तथा अखिल भारतीय ही नहीं व्यापार के अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में भी रखते हैं। विवरण चाहे कश्मीर के इतिहास का हो, चाहे समकाल का- लेखक के चित्त में स्त्रियों की दशा (अधिकांशत: दुर्दशा ही) के सवाल की सतत उपस्थिति आश्वस्तिदायक है।
कश्मीरनामा: अशोक कुमार पांडेय; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 625 रुपए।

रचना की जमीन
यह किताब साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि पर लिखे गए लेखों का एक प्रकार से कोलाज है। इसके लेखों को तीन खंडों में विभाजित किया गया है। पहला खंड ‘भाषा और समाज पर सोचते हुए’ में वे टिप्पणियां हैं, जो जब-तब पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। लेखिका संध्या सिंह ने इन लेखों के जरिए शिक्षा पर काम करते हुए अपने समय और समाज को समझने की कोशिश की है। इसमें भाषा, साहित्य, पुरस्कारों की राजनीति आदि के बारे में चिंतन है। दूसरे खंड ‘कविता को पढ़ते हुए’ में कविता के बारे में अलग ढंग से विचार किया गया है। कवि और कविता को लेखिका ने अपनी नजर से पढ़ने की कोशिश की है। ये टिप्पणियां एक तरह से कविता से संवाद हैं, कविता से बातचीत हैं।
तीसरे खंड ‘किताबों से गुजरते हुए’ में कुछ किताबों के जरिए अपने समय और समाज को समझने, साहित्यिक परिदृश्य को देखने का प्रयास है। इनमें एक तरह की समीक्षात्मक दृष्टि है। इसमें एक स्त्री की नजर से किताबों और उनकी विषय-वस्तु की व्याख्या है।
पूरी किताब का कलेवर लालित्यपूर्ण है। टिप्पणियों की भाषा-शैली बतकही और ललित संवाद की है। बिना किसी सैद्धांकि दबाव और वैचारिक बोझ लादने के प्रयास के इस किताब की टिप्पणियां सहज ढंग से अपनी बात कहती चलती हैं। सीधे-सरल ढंग से। इनमें सहज अनुभव भी गुंथे हुए हैं, जो प्रसंगवश कथा का रस घोलते हुए प्रकट होते रहते हैं।
रचना की जमीन : संध्या सिंह; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 450 रुपए।

वैदिक सनातन हिंदुत्व
इस पुस्तक में दिए विचार अंतिम नहीं हो सकते। वैसे भी यह पुस्तक सनातन जीवन दर्शन पर आधारित है, जहां ऋषि-मुनि स्वयं ‘नेति नेति’ कहते हैं। यानी यह नहीं, यह नहीं। यह अंत नहीं है, यही नहीं वही नहीं। यानी आप जो समझ रहे हैं, वह भी अंतिम नहीं है। वह आपका अंतिम अनुभव हो सकता है। मगर किसी दूसरे का भी हो, जरूरी नहीं है। जितना अनुभव किया जाए, उतना उसे विस्तार मिलता है। इसका सीधा संबंध ईश्वर-ब्रह्म से है। यानी यह प्रकृति से संबंधित है। ज्ञान और विचारों का कोई अंत भला हो सकता है! नेति नेति उपनिषद का महावाक्य ज्ञान की प्राप्ति का सतत प्रयास करवाता है, जो कभी अंतिम नहीं हो सकता। इस निरंतरता के कारण ही इस जीवनदर्शन का नाम ‘सनातन’ पड़ा। जो सनातन है वह किसी बिंदु पर अंतिम कैसे हो सकता है।
ज्ञान का बोध होते ही उसे व्यक्त करने में भाषा और शब्दों का चयन भी उतना ही मुश्किल होता है। आमतौर पर हमारी भाषा इसे व्यक्त कर पाने में अक्षम हो जाती है। भाषा और शब्दों के सामर्थ्य तो वेद और ऋषियों के सम्मुख भी आया होगा, मगर फिर भी उन्होंने प्रयास किया। उस प्रयास को आगे बढ़ाने का भाव ही नेति नेति में है। यह प्रत्येक मानव को करना चाहिए। यहां भी, इस पुस्तक को पढ़ते हुए भी इसी भाव को पकड़ कर, मान कर चलना होगा। मनोज सिंह पेशे से इंजीनियर हैं। उन्होंने सनातन जीवन दर्शन को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने-समझने का प्रयास किया है। इस तरह यह पुस्तक किसी धार्मिक आवेग में, किसी विचार-दृष्टि को सही साबित करने या उसे स्थापित करने के प्रयास से नहीं, बल्कि तार्किक ढंग से समझने की कोशिश है।
वैदिक सनातन हिंदुत्व : मनोज सिंह; प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली; 250 रुपए।


