कुकी गिलहरी का घर एक बड़े से पार्क के घने पेड़ पर है। पार्क बहुत सुंदर है। वहां खूब सारे पेड़-पौधे हैं। क्यारियों में कतारों में लगे फूल किसी अनुशासनप्रिय बच्चे जैसे लगते हैं। चारों ओर हरियाली फैली है। कुकी जिस अशोक के पेड़ पर रहती है, उसके बड़े-बड़े पत्ते और मोटा तना उसे बहुत पसंद है। अपनी पूंछ हिलाती हुई वह सरपट उस तने पर दौड़ती रहती है।

पार्क में सुबह-शाम बहुत सारे लोग सैर करने आते हैं। छोटे-छोटे प्यारे बच्चे अपने मम्मी-पापा, दादा-दादी और नाना-नानी के साथ आते हैं। कई बार बच्चे टोलियों में खेलते-कूदते हैं। उनका शोर और हंसी कुकी को बिल्कुल बुरी नहीं लगती। उसे तो बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं, जो पार्क को अपनी शरारतों से रंगीन बना देते हैं। दोपहर में जब पार्क खाली हो जाता है, तब सन्नाटा छा जाता है। उस समय कुकी खूब सोती है। सर्दियों में ऐसा नहीं होता। तब दोपहर में भी लोग आते हैं। घास पर चादर बिछाकर संतरा, मूंगफली और न जाने क्या-क्या खाते हैं। कुकी को भी तब मूंगफली, चने और रोटी के टुकड़े मिल जाते हैं।

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पार्क में कोई तेज चलता है, कोई दौड़ लगाता है। बुज़ुर्ग धीरे-धीरे टहलते हैं। युवा लड़के-लड़कियों के कानों में ईयरफोन लगे होते हैं। बच्चे झूले झूलते हैं, दौड़ते हैं और खेलते हैं। कुछ लोग आंखें बंद कर घास पर बैठ जाते हैं। कुकी को यह सब देखकर बहुत मज़ा आता है। लोग कुकी के पेड़ के पास बने गोल चबूतरे पर कभी बिस्कुट तो कभी दाने डाल जाते हैं। बच्चे रोज उससे मिलने आते हैं। पहले कुकी उनसे डरती थी, लेकिन अब वे उसके दोस्त बन गए हैं। वह उनके सामने बिना डरे खा लेती है और कुट-कुट की आवाज निकालकर धन्यवाद भी कहती है।

शाम होते ही लोग एक-एक कर जाने लगते हैं। खाली पार्क देखकर कुकी उदास हो गई। वह चबूतरे पर बैठी ही थी कि उसकी नजर एक चमकती चीज़ पर पड़ी। धूप में वह बहुत सुंदर लग रही थी। वह एक लाल कमानी और नीले प्लास्टिक का चश्मा था। ‘यह जरूर किसी बच्चे का होगा,’ उसकी मां बोली। कुकी ने चश्मा पहना और इठलाते हुए फुदकने लगी। उसकी दोस्त मिकमिक बोली, ‘तुम तो बहुत सुंदर लग रही हो।’ अब कुकी को हर चीज नीली दिखाई देने लगी—नीले पत्ते, नीली घास, नीले फूल।

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‘जादू हो गया,’ कुकी बोली। उसकी मां हंसते हुए बोली, ‘रंग वही हैं, बस चश्मा नीला है।’ कुकी को अपनी भूल पर हंसी आ गई। रात होते ही कुकी घबरा गई। उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मां ने चश्मा उतारते हुए समझाया कि यह धूप का चश्मा है। खेलने वाला चश्मा। कुकी बोली, ‘कल मैं यह चश्मा उस बच्चे को लौटा दूंगी।’ मां ने उसकी बात से सहमति जताई।

अगले दिन बच्चों की एक टोली उसके पेड़ के पास कुछ ढूंढती हुई आई। एक लड़का बोला, ‘मेरा चश्मा खो गया।’ कुकी समझ गई। वह फुदकती हुई आई और चश्मा उसकी ओर बढ़ा दिया। बच्चा बहुत खुश हुआ। सभी बच्चों ने कुकी को प्यार से सहलाया। आज कुकी भी कभी-कभी एक चश्मा पहनती है, जिससे सब कुछ लाल दिखाई देता है। यह चश्मा उसे उसी बच्चों की टोली ने उपहार में दिया है।