Dunia Mere Aage, Jansatta Online
दुनिया मेरे आगे: मोबाइल की बीमारी संवादहीनता को दे चुकी है जन्म, एक जैसी दिनचर्या से जीवन में आ जाती है नीरसता

लोग केवल एक बात कहते हैं कि समय ही नहीं है। घर से नौकरी, नौकरी से घर। बचा हुआ समय…

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दुनिया मेरे आगे: हमारे किसी काम को नए नजरिए से देखता हैं कोई भी नया व्यक्ति, ईमानदार राय मिलना काम को बेहतर बनाने का सबसे कारगर उपाय

जिस तरह हम स्कूल में कई सारी नई बातें सीखते हैं, वैसे हमें यह भी सीखना होगा कि किस तरह…

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दुनिया मेरे आगे: विकास की कहानियां प्रदर्शित करती दिखती हैं झांकियां, दुनिया को कूटनीति के तहत अपनी ताकत से परिचित कराना

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें विप्रम के विचार।

Duniya Mere Aage, दुनिया मेरे आगे
दुनिया मेरे आगे: केवल ज्ञान नहीं बल्कि हमारे व्यक्तित्व का गहन निरीक्षण करता है ‘दर्शन’, आलोचना करने की देता है क्षमता

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें पंकज त्रिवेदी के विचार।

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दुनिया मेरे आगे: आलस्य का बढ़ जाना शारीरिक निष्क्रियता ही नहीं बल्कि मन की जड़ता का भी प्रतीक, समय की बर्बादी के साथ-साथ होता है आत्मा की ऊर्जा का क्षय

आलस्य का सबसे सूक्ष्म प्रभाव हमें हमारे लक्ष्यों से भटका देता है। जो समय सपनों को साकार करने में लगना…

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दुनिया मेरे आगे: आज के बच्चे स्वयं ले रहे अपना निर्णय, सफलता का लड़की होने से किया जाता है मापदंड

यह परिवर्तन एक दिन, एक दशक का नहीं है, न ही किसी आंदोलन के नारों से जन्मा है और न…

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दुनिया मेरे आगे: भारतीय संस्कृति में है आभार का विशेष महत्त्व, हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाता है बेहतर

आभार हमें आत्म-विकास के लिए प्रेरित करता है। जब हम अपने जीवन में मौजूद अच्छाइयों की कद्र करते हैं, तो…

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दुनिया मेरे आगे: महानगरों में एकल परिवारों और एक बच्चे का चलन तेजी से बढ़ा, अभिभावक बचपन में अपने बच्चे की हर जिद को करते हैं पूरा

जानकारी ही बचाव है। इस मसले पर बेहद संवेदनशील होकर जागरूकता अभियान चलाने की नितांत आवश्यकता है। हमें सामाजिक सरोकारों…

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दुनिया मेरे आगे: मोबाइल के दौर ने व्यक्तिगत संवाद को लगा दिया है ग्रहण, एक ही घर में रहते हुए बिना संवाद के भी अजनबी हो जाते हैं लोग

संवाद केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं होता। एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक सहमति में हिलाया गया सिर भी बहुत…

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दुनिया मेरे आगे: वृद्धाश्रम केवल ईंट-पत्थर के भवन नहीं बल्कि सपनों, आशाओं और रिश्तों के टूटने की होती हैं हृदयविदारक कहानियां, मानव सभ्यता का चरम विकास

वृद्धों के अनुभवों का विशाल भंडार, जिसे कभी समाज की धरोहर माना जाता था, आज उनके ज्ञान को ‘पुरानी बातें’…

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दुनिया मेरे आगे: बस-ट्रेन में सफर करते वक्त सहयात्रियों से बातचीत करते हैं सामान्य लोग, देश में बढ़ती जनसंख्या हो सकती है एक समस्या

हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या एक समस्या हो सकती है, मगर एक हकीकत यह भी है कि इस कारण से…

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दुनिया मेरे आगे: लक्ष्यहीन हो जाने पर मनुष्य का जीवन लंबा नहीं चल पाता, जीवन का उत्तर-काल होता है बहुत महत्वपूर्ण

सच्चे मन से की गई समाज सेवा हृदय को परमानंद से भर देती है। इसका सुख वही ले पाते हैं,…

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